जो आदमी जितनी मुस्कुराहट पहने घूम रहा हो, जान लेना कि भीतर उसके घोर व्यथा है

तुम्हारे जीवन में दुःख आएगा, तुम रो पड़ोगे। तुम्हारे जीवन से दुःख जाएगा, तो भी तुम रो पड़ोगे। सामान्य भाषा में इस दूसरे रोने को हम कह देते हैं? ख़ुशी के आँसू। वो वास्तव में ख़ुशी के आँसू नहीं होते। वो होते दुःख के ही हैं। पर वो जाते हुए दुःख के आँसू होते हैं। वो दुःख से मुक्ति के आँसू होते हैं। गाड़ी आती है तो भी दिखती है, और गाड़ी वापस लौटती है तो भी दिखती है।

रोना, इसीलिए जानने वालों ने बड़े स्वास्थ्य की बात कही है। वो कहते हैं कि रोना भली बात है, खूब रोया करो, रोने से आँखें साफ़ होती हैं, और मन भी। अच्छी बात है रोना। छोटी छोटी बात पर रो लिया करो। और रोने का पीड़ा से कोई संबंध हो ये ज़रूरी नहीं। कोई कहानी सुनी आँखें छलछला गयी, ठीक है, फिल्म देख रहे हो, फिल्म देखते देखते चार बूंदे लुढ़क गयीं, कोई बुराई थोड़े ही है। ये कमज़ोरी का लक्षण नहीं है। और न ही ये किसी मानसिक बीमारी का लक्षण है। यूँ ही बैठे बैठे भी अगर आँखें गीली हो जाएँ तो इसमें कोई हानि नहीं है, ये स्वास्थ्य की बात है।

हँसी से ज़्यादा गहराई होती है, आँसुओं में। लेकिन मालूम है, हम अकसर रोते वक़्त सुन्दर नहीं लगते, जबकि आँसू बहुत सुन्दर होते हैं, बताओ क्यों? आँसुओं में तो कितनी सुंदरता है, आँसुओं पर देखो कितनी कवितायें लिखी गयी हैं। कोई कहता है आँखों से मोती झरे, कोई कहता है ओस की बूँदें हैं। लेकिन फिर भी हम जब रोते हैं, हम सुन्दर नहीं लगते, बताओ क्यों? आमतौर पर ! क्योंकि हम आँसुओं के विरोध में खड़े हो जाते हैं। हम अपने आप को रोने देते नहीं। तो हमारे चेहरे पर गृहयुद्ध शुरू हो जाता है। आँसू निकलना चाहते हैं और हम आँसुओं को ले कर के शर्मसार रहते हैं। कि मैं रो क्यों दिया ! और उन्हें हम बाधित करने की, अवरुद्ध करने की कोशिश में लग जाते हैं; अब चेहरा कैसा हो जाता है? कि आँसू तो निकल रहे हैं, पर तुम कोशिश कर रहे हो कि ना निकलें। नहीं मैं थोड़े ही रो रहा हूँ ! मस्त हो के रोओ, चेहरा भी फिर आँसुओं जैसा ही सुन्दर दिखेगा। हमने मन में ये गलत समीकरण बैठा लिया है कि आँसू का संबंध दुःख से है, नहीं है, बिलकुल नहीं है।

अगर आँसू सच्चे हैं तो उनका संबंध उत्सव और आनंद से है, उनका संबंध जाते हुए दुःख से है। आँसूओं का अर्थ ये नहीं है कि तुम दुखी हो, आँसुओं का ये अर्थ भी हो सकता है कि तुम आनंदित हो। मुक्त अनुभव कर रहे हो, भीतर की जकड़ को छोड़ने के लिए। जैसे किसी ने कलेजा भींच रखा हो, और फिर ज़रा तुम तनाव मुक्त हो जाओ, ज़रा तुम आश्वस्त और स्वतंत्र अनुभव करो। और जिस चीज़ ने भींच रखा है, उसको तुम छोड़ दो, या वो तुम्हें छोड़ दे। ऐसा है आँसुओं का निकलना। कभी देखा है तनाव में तुम्हारा शरीर भी कैसा अकड़ जाता है? पाँव का अंगूठा यूँ मुड़ जायेगा, मुट्ठियाँ भिंच जाएँगी। देखा है? और जब तनाव जाता है, एक सहज सुरक्षा की आश्वस्ति उठती है, तो वो साड़ी जकड़ खुल जाती है, ज़रा विश्राम मिल जाता है।

अस्तित्वगत रूप से खूबसूरत बात है आँसुओं का बहना। तुम्हारी मनुष्यता का प्रतीक है, पशु नहीं रोते। लेकिन सांस्कृतिक रूप से रोना एक वर्जना है, एक कल्चरल टैबू है। अस्तित्व नहीं कहता कि मत रोओ। समाज कहता है, संस्कृति कहती है। कि मत रोओ। और फिर चूंकि वो कहती है मत रोओ, तो रोने के विपरीत जो उसको लगता है उसपर महत्व रखती है। वो क्या कहती है? कि हर समय, तुम मुस्कुराते नज़र आओ। और ये बात भारतीय भी नहीं है, तुम राम को, कृष्ण को मूर्तियों में भी मुस्कुराता नहीं पाओगे। शिव की मुस्कराहट देखी है क्या? ये बात बड़ी पाश्चात्य है। यहाँ ऋषिकेश में जितने भी विदेशी मित्र घूम रहे हैं इनको देखना। इन्होंने मुस्कान चिपका रखी होती है। क्योंकि ये डरे हैं, आतंकित हैं, इन्हें रोने से बहुत डर लगता है। और रो ये भीतर रहे हैं। उस रूदन को, उस क्रंदन को,  छुपाने के लिए, ये क्या पहनते हैं ऊपर? मुस्कुराहट।

जो आदमी जितनी मुस्कुराहट पहने घूम रहा हो, जान लेना कि भीतर उसके घोर व्यथा है। अगर आप सहज हो, तो ना आपको उत्तेजना में हँसने की ज़रुरत है, ना ही उत्तेजना में रोने की ज़रुरत है। फिर आपका हास्य भी, सहज, सुमधुर, सरल, सूक्ष्म होगाा, और आपके आँसू भी उतने ही सहज होंगे। कभी हँस दिए, कभी रो दिए। कौन सी बड़ी बात है? आप आवश्यक नहीं समझोगे, कोई एक भाव अपने चेहरे पर ढोना। आप ये नहीं कहोगे कि मेरी जितनी भी तसवीरें आयें, वो सब? हँसती हुई आयें। हँसती हुई आ गयी तो ठीक, हँसती हुई नहीं आई, तो भी ठीक। और रोती हुई आ गयी तो भी बराबर ही ठीक।



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