विद्रोह

  • “सामान्य की जो हमारी परिभाषा है, वो बड़ी गड़बड़ हो गयी है। इसलिए हम विद्रोह नहीं कर पाते। विद्रोह उठता भी है, तो हम उसको दबा देते हैं।”

 

  • “हम बीमारी को बीमारी का नाम ही नहीं दे पाते। हम सब समर्थ हैं। ताकत हम सब में है, बुरा न होने की, कष्ट में न जीने की, विद्रोह कर देने की। पर विद्रोह तो आप तब करो ना, बंधन से तो आप तब छूटो ना, जब पहले आप बंधन को बंधन मानो।”

 

  • “जवानी ही प्यार और विद्रोह कर सकती है।”

 

  • “अपने ही नकली चेहरे के प्रति विद्रोह कर पाना, ज़रूरी तो बहुत होता है, पर ज़बरदस्ती नहीं हो सकता।”

 

  • “न तुम्हें पुराने से विद्रोह करना है, न नए की आकांक्षा, तब जीवन में वास्तव में कुछ नया घटित होता है।”

 

  • “विद्रोह के लिए सामर्थ्य की प्रतीक्षा मत करो, विद्रोह से ही सामर्थ्य आता है।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं