ज़्यादा सोचने की समस्या

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)प्रश्न: आचार्य जी, मैं बहुत ज़्यादा क्यों सोचती हूँ?

आचार्य प्रशांत: “टू मच थिंकिंग” तब होती है, विचार का अतिरेग, वो तब होता है जब आप कर्म का स्थान विचार को दे देते हैं; कर्म का विकल्प बना लेते हैं विचार को। चार कदम चलना है, चल रहे नहीं, डर के मारे या आलस के मारे, या धारणा के मारे, जो भी बात है। तो जो भीतर कमी रह गयी, उसकी क्षति पूर्ती कैसे करते हैं फिर? चलने के बारे में? सोच सोच के। करिये ना! सोचिये मत। और जो कर्म में डूबा हुआ है उसको सोचने का अवकाश नहीं मिलेगा। अगर आप जान ही गए हैं, पूर्णतया नहीं, मान लीजिये आंशिक भी; अंशतया भी यदि आपको पता है कि क्या करणीय है, क्या उचित है, तो उसको करने में क्यों नहीं उद्यत हो जातीं?

जितनी ऊर्जा, जितना समय सोच को दे रहीं हैं, वो सब जाना किस तरफ चाहिए था? कर्म की ओर! और ऐसा नहीं है कि आपको बिलकुल नहीं पता कि उचित कर्म क्या है! पता तो है। और उसका प्रमाण है आपकी बेचैनी। आप यदि बिलकुल ही न जानती होती कि क्या उचित है तो बेचैन नहीं हो सकती थीं। बेचैनी उठती ही तब है जब सत्य को जान बूझ कर स्थगित किया जाता है। पता है, पर टला हुआ है। तब बेचैनी उठेगी। क्यों टालती हैं? कर डालिये। जो करने में लग गया, वो सोचेगा कैसे? और जो कर नहीं रहा है वो दिन रात बैठे बैठे क्या करेगा? दिमाग चलाएगा। मैं तो सीख ही यही देता हूँ, सर मत चलाओ, हाथ चलाओ। सर झुकाओ, हाथ चलाओ। और जिसका सर झुका नहीं हुआ है उसका सर? खूब चले, चकरघिन्नी की तरह दौड़ रहा है, दौड़ रहा है। पहुँच कहाँ रहा है? कहीं नहीं। पर दौड़ खूब रहा है।

हाथ चलाइये ना! आप जानती हैं भली भांति कि आप जीवन के जिस मुक़ाम पर खड़ी हैं, वहाँ पर क्या करणीय है। कूदिये उसमें। जो कर्म में उतर गया, उसको फिर ये सोचने का भी समय नहीं रहता कि कर्म का अंजाम क्या होगा!

श्रोता: काम भी करुँगी तो उसमें भी थकूंगी, पर जो चीज़ें अनसुलझी हैं वो चलती रहती हैं।

वक्ता: जो अनसुलझे हैं उनमें ऐसा तो नहीं कि आपको रेज़ोल्यूशन का, समाधान का,  बिलकुल अंदाज़ा नहीं।

श्रोता: मतलब, एक विचार आता है कि क्या करना है, फिर दूसरा विचार आता है उसको ख़त्म करने के लिये।

वक्ता: जो कुछ भी आता है, जितनी भी रौशनी है, उस पर आगे क्यों नहीं बढ़तीं? मान लीजिये जिस दिशा बढ़ीं, वो गलत भी सिद्ध हुई, तो भी आप बढ़ीं तो, प्रयोग तो किया! इतना तो पता चला कि दिशा अब अनुकरणीय नहीं है। कुछ तो उन्नति हुई। बैठे बैठे, खोपड़ा घुमाने से क्या होगा?

श्रोता: अंदर से बहुत साफ़ साफ़ पता चलता है, पर बहुत सारे डर हैं शायद।

वक्ता: वो भी तभी तक हैं जब तक आगे नहीं बढ़ रहीं। कदम बढ़ा दीजिये, दहलीज लांघ जाईये, उसके बाद सोचना विचारना अपने आप ख़तम हो जाएगा। जब तक यहाँ किनारे खड़े हो तब तक कितना भी सोचो, कूद गए एक बार गंगा में…

फुरसत नहीं मिलनी चाहिये सोचने की! फिर, सोचिये सिर्फ तब, जब जो राह चुनी है उसमें अँधेरा छाने लगे। तब ठिठक के रुकिये, तब सोचिये! पर सोचना हमेशा सावधिक होना चाहिए। समय-बंध। अनंतकालीन नहीं होना चाहिये। अनिश्चितकालीन नहीं होना चाहिए, सदा सीमाबद्ध होना चाहिए। सोचना अपने आप में कोई पेशा तो नहीं हो सकता। न जीवन का प्रयोजन हो सकता है। और कारण है उसका, कारण ये है कि सोच हमेशा अपनी सीमाओं में चलती है। सोच सोच के उस सीमा से आगे थोड़े ही जा पाओगे? उससे आगे तो जीवन में उतर कर ही जाओगे!

करिये, कर डालिये। ख्याल से काम नहीं चलेगा। कर डालने से जो विचारक है वही बदल जाता है। जब विचारक बदलेगा तो? विचार बदल ही जाएँगे। और विचार करते रहने से विचारक सुदृढ़ होता है, बदलता नहीं। सुदृढ़ होने में और बदल जाने में अंतर समझते हो ना? सोच-सोच के आप अपने आप को और मोटा, और पुख्ता, और स्थायी बना लेते हो। लेकिन कहाँ पर? वहीं पर जहाँ आप हो। वैसे ही जैसे आप हो। और कर्म आपको बदल सकता है। उचित कर्म। क्योंकि उचित कर्म का अर्थ ही होता है, अपनी सीमाओं को चुनौती देना, उनसे आगे जाना। विचारक बदल जाएगा, विचारक की सीमाएँ टूटेंगी, वो कुछ नया हो जाएगा। वो कुछ नया हो जाएगा, उसके विचार स्वतः ही बदलेंगे। ये इंतज़ार मत करो कि तुम सोचते रहोगे और सोच बदल जाएगी। न। सोचते रहने से सोच नहीं बदलती। करने से, जीने से सोच बदलती है।

(श्रोता को देखते हुए) तनाव में हैं, कुछ भीतर संघर्ष चल रहा है।

श्रोता: आचार्य जी, मैं एक बड़ा लक्ष्य बना लेता हूँ किसी को देख कर के और उसके बाद जब उस लक्ष्य को पूरा करने निकलता हूँ  तो बीच में ही मैं बहुत डर जाता हूँ और उसे छोड़ देता हूँ|

वक्ता: तुम राफ्टिंग करो। ये सारी खुराफ़ात दिमाग से अपने आप झड़ जाएगी। कौन आगे, कौन पीछे? तुम क्या उखाड़ लोगे, कोई और क्या उखाड़ लेगा? किन चक्करों में फँसे हुए हो? माहौल ठीक नहीं है वहाँ पर इस तरह की बातें तैर रहीं हैं। वो तैरती हैं तो तुम्हारे भी दिमाग में घुस जाती हैं।

मैं वास्तव में नहीं जानता कि उत्तर क्या दूँ? ये उत्तर देने के लिए मुझे कुछ और होना पड़ेगा। अभी तो मैं सिर्फ ये कह सकता हूँ, “अप्रासंगिक। बात अप्रासंगिक है, बात का कोई मूल्य ही नहीं है। क्या जवाब दूँ?

तो, जैसे ये बच्चा है, पूछे कि पत्थर चबाऊँ कि रेत? इसको बोलो, “ठण्ड लग रही है तू कोट पहन ले। तुझे ठण्ड ज़्यादा लग गयी है, तू बहकी बहकी बातें करने लगा है। तुझे जवाब नहीं कोट चाहिए।”

क्या करना है?

श्रोता: वैसे लाइफ नार्मल चल रही होती है, लेकिन…

वक्ता: ये नॉर्मल नहीं है। तुम जिस दुनिया में हो, वहाँ ऐसे ही सवाल आएँगे। तुम्हें सवालों का उत्तर नहीं चाहिए, तुम्हें उस दुनिया से ही बाहर आना होगा। तुम जिस दुनिया में हो वहाँ सब कुछ वैसा ही होता है जैसी अभी तुम्हारी हालत है। इतना बड़ा मुँह हो गया है तुम्हारा! वो देखो, शर्ट के बटन टूट रहे हैं। देखो! और सवाल तुम पूछ रहे हो कि कोई मुझसे आगे है, मैं उसकी टांग खींच दूंगा, गिरा दूंगा, आगे निकल जाऊँगा, निकल नहीं पाया, मैं चोक हो गया! तोंद नहीं देख रहे। क्यों?

इसीलिए जीवन है? इस तरह की बातें करने के लिए? पूरा सन्दर्भ ही, जिस सन्दर्भ में तुम सवाल कर रहे हो ना, वही गड़बड़ है। जिस केंद्र से तुम सवाल पूछ रहे हो, वही गड़बड़ है। वहाँ से जो भी सवाल उठेगा वो ऐसा ही होगा, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, डर, हीनता, उपलब्धि, छटपटाहट, परिग्रह। बस। अभी भी तुम्हारे माथे पर शिकन है। तुम न जाने किस बारे में इतने गंभीर हो! मन कर रहा है मेरा, मैं कैलेंडर थोड़ा उल्टा चला दूँ और तुमको वैसा ही सत्कार दूँ, जैसा एक बार दिया था।

एक बार हम लोग आ रहे थे, तो मैं बाइक पर था, जनाब गाड़ी पर थे। ५,७ साल पहले की बात होगी। इधर ही आ रहे थे, ऋषिकेश तरफ ही, शिवपुरी में ही था शिविर। तो मैं अपना बाइक चला रहा हूँ, बुलेट; और उसकी पिछली सीट वैसी ही जैसी बुलेट की होती है, मैंने उसको बदलवाया नहीं है। तो रात भर मैं चलाता रहा, तब तो ये आये नहीं। जब भोर हो गयी तो इनको शौक चढ़ा, बोलते हैं हम भी बुलेट पर बैठेंगे। मैंने कहा, “रात में जब ठण्ड खा रहा था मैं तब तुम नहीं आये, आओ बैठो।” ये बैठे। अब तो रोड बन गयी है, आज से ५, ७ साल पहले रोड कैसी होती थी? याद है? अरे! रोड ही नहीं होती थी। तो इनको बैठाया, और सिर्फ गड्ढों में चलायी। खोजा गड्ढे कहाँ हैं, जहाँ होता था उसी में, तो उससे फिर थोड़े ये समाधिस्त हुए।

(श्रोतागण हँसते हैं)

उससे दिमाग का फितूर थोड़ा शांत हुआ। अब लेकिन पिछले रेचन को ५ साल बीत गए हैं। तो अब फिर से दिमाग पर बहुत सारी चीज़ें आ गयीं हैं। वैसे ही फिर से इनको सत्कार दोबारा देना होगा।

वो देखो वहाँ, साजिश तैयार हो रही है तुम्हारे लिए।

और उससे भी पहले गए थे एक बार कनाताल, तो वहाँ पहाड़ को काट काट के रिसोर्ट बने थे। तो हम जिस में रुके थे वो तीन तलों पर था। एक तल, दूसरा तल, और फिर उससे भी नीचे वाला तल था एक और। तो लोगों ने सबसे ऊपर वाले तल पर क्रिकेट खेलना शुरू किया, और वहाँ से वो गेंद मार दें नीचे। और उसके बाद इनकी नियुक्ति की, कि तुम गेंद ले कर के आओगे।

(श्रोतागण हँसते हैं)

और ये जितनी बार नीचे जाएँ उतनी बार नारा लगे, हमारा नेता कैसा हो? नवीन भाई जैसा हो। तो इस तरह का उपचार इनको हर साल दो साल मिलता रहता था, तो ये ठीक रहते थे। अभी इधर हुआ नहीं है। अब आज रात कुछ प्रबंध होना चाहिए। देखो जो भी करना है! पर ज़रूरी है बहुत। नहीं तो ये ऐसे ही सवाल पूछेंगे, कि कोई आगे निकल गया उसको पकड़ें कैसे!



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: ज़्यादा सोचने की समस्या

निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

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