सहज और असहज संतुलन

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)प्रश्न: आचार्य जी, असहज संतुलन और सहज संतुलन में क्या भेद है?

आचार्य प्रशांत:

सहज संतुलन होता है कि जहाँ पर तुम्हें असहज किया गया तो तुम पुनः सहज हो जाओगे।

उसको स्टेबल एक्विलिब्रियम  भी बोलते हैं। समझ रहे हो बात को?

दर्शाऊँ, कैसे होता है?

ये पेन है अभी यहाँ पर (एक मुड़ी हुई कॉपी के अंदरूनी मोड़ की सतह पर) है, यह कहलायेगा सहज संतुलन, क्यों? क्योंकि इसको तुम असहज भी करोगे, यहाँ कर दोगे (अंदरूनी मोड़ के ऊपर की तरफ, फिसलपट्टी के जैसे), तो ये वापस (फिसल कर) वहीं आ जाएगा जहाँ जिसे आना है (कॉपी के मुड़ने से बनी घाटी में)। इसे इसका घर पता है, इसे इसकी मंज़िल पता है, इसे इसका मालिक पता है। तुम इसके साथ धोखाधड़ी नहीं कर सकते। तुम इसके साथ चालाकी करोगे, तुम इसी के साथ चालाकी कर के दूर भी ले गए इसकी मंज़िल से तो ये क्या कर रहा है? (फिर से फिसल कर घाटी में आ रहा है)

ऐसे बहुत कम लोग होते हैं कि जिन्हें उनकी सहजता से, उनके ठिकाने से, अगर तुम विस्थापित भी कर दो, तो वो खुद ही वापस पहुँच जाएँ। जैसे ये वापस पहुँच रहा है। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं। ये सहज संतुलन है, ये संत का संतुलन है। तुम उसे हिला दो, तुम उसे परेशान कर दो, कर सकते हो; पलक झपकते ही देखोगे क्या? वो जैसा था फिर वैसा ही हो गया। तुम्हारी सारी कोशिश व्यर्थ गयी।

और संसारी का संतुलन ऐसा होता है। (मुड़ी हुई कॉपी को उल्टा करते हुए, उसकी चोटी पर पेन को टिकाते हुए) अब संतुलन तो है, पर इतना असहज है कि बिलकुल दिल धक् धक् कर रहा है। क्योंकि बच्चू ज़रा सा डिगे नहीं कि? मौत है। ये है संसारी का संतुलन।

दिखने में दोनों एक जैसे दिखेंगे क्योंकि दिखने में दोनों स्थिर हैं। पर एक को बड़ी श्रद्धा है, आस्था है, अटूट निष्ठा है, उसे पता है के मेरा कुछ हो नहीं सकता, तुम हिला लो जो हिला सकते हो। तुम उखाड़ लो जो उखाड़ सकते हो।  लो उठाओ, मुझे यहाँ रख दो। मैं क्या करूँगा? मैं फिर अपने घर में वापस आ जाऊँगा। मेरे घर का नाम है आत्मा, मेरे घर का नाम है शांति। मेरे घर का नाम है राम। मेरे घर का नाम है खुदाई। जो भी कह लो वो मेरे घर का नाम है, तुम मुझे कितना हटा लो अगले दिन पाओगे कि मैं? वापस आ गया।

ये संसारी का संतुलन है (पेन को मुड़ी हुई कॉपी की चोटी पर रखते हुए)। किसी तरीके से (उसको चोटी पर बैठाने की कोशिश करते हुए); हो गयी मिट्टी (पेन गिर जाता है)। किसी तरीके से जान हथेली पर रख के टिके हुए हैं। अब ये संतुलन में तो है, एक्विलिब्रियम  में तो है पर देखो कितना अस्थिर है, अस्थायी है। जो अस्थायी है वही असहज है। गिरे जा रहे हैं, काल इन्हें खाये जा रहा है। इन्हें पता है मौत आई आई।

और, संत अमर हो गया है, क्यों? क्योंकि समय बीतता रहे वो वहीं रहेगा जहाँ वो है। समय उसे उसकी निश्चित स्थिति से, उसकी परम अवस्था से, अब डिगा नहीं सकता। वो अमर हो गया। ये (संसारी) मौत के भय में जियेगा। ये मिटने के भय में जियेगा, ये बड़ी असुरक्षा में जियेगा। इसे पता है कि किसी ने ज़रा सा छेड़ा नहीं कि इसकी हालत खराब, जैसे हमारी हो जाती है। अभी कोई आ के छेड़ जाए तो आपका क्या होगा? शान्ति भंग हो जाती है कि नहीं?

तो, वैसे ही ये है, ज़रा सा किसी ने छेड़ा नहीं कि लो (पेन चोटी के ऊपर से फिसल के गिर जाता है), हो गए फिर मिट्टी। और फिर (पेन उठाते हुए) अब करो मेहनत, अब बड़ी मुश्किल से इनका घरोंदा बनाओ, इन्हें इनके घर में ला के रखो। और फिर किसी ने छेड़ा नहीं कि फिर हो गए।

ये है असहज संतुलन। संतुलन तो यहाँ भी है। कितना असहज। जैसे हमारी असहज मुस्कुराहट, जैसे हमारे असहज रिश्ते। अगर छिड़े तो टूट जाएँगे। तो इसीलिए हम उन्हें छिड़ने नहीं देते। इसीलिए हम असली बातें कभी करते ही नहीं हैं। संत असली बातें करेगा। वो कहेगा, “आओ, जितनी गड़बड़ हो सकती है सब करते हैं। क्योंकि मुझे पता है तुम कितनी भी गड़बड़ कर लो, मुझे तो लौट लौट के अपनी मंज़िल पर, अपने घर पर वापस आ ही जाना है।” यहाँ बड़ी सुरक्षा है, यहाँ पर कुछ भी वर्जित नहीं है। यहाँ जीवन एक खेल बन चुका है, आओ खेलें। कुछ भी करो।

यहाँ पर (असहज संतुलन) जीवन पाबंदी है। यहाँ पर जीवन दायरा है, यहाँ पर जीवन धक् धक् धड़कता हुआ दिल है, “कभी भी कुछ भी गलत हो सकता है भाई! सारे दरवाज़ों में ताले देना। बंदूक कहाँ है? बीमा कहाँ है? कभी भी कुछ भी गलत हो सकता है। देखते रहना कहाँ जहाँ गड़बड़ चल रही है। बच्चों के लिए लैपटॉप में फ़ायरवॉल लगाओ। बीवी का व्हाट्सऐप  चेक करते रहो। दफ्तर की राजनीति पर कान रखो। कभी भी कुछ भी गलत हो सकता है।” ये डरा रहेगा। हो भी जाता है बेचारे के साथ गलत (मुड़ी हुई कॉपी की चोटी पर रखे पेन को फूंक मारते हुए)। अरे! (पेन गिर जाता है) फूँकने से पहले ही दम टूट गया इनका।

अब ऐसे जीना है (सहज) या ऐसे (असहज) जीना है, तुम जानो। सारा खेल बस इसका (मुड़ी हुई कॉपी, सीधी), और इसका है (मुड़ी हुई कॉपी, उलटी)। कलम तुम्हारे हाथ में है।

श्रोता: पर आचार्य जी जैसे कि आपने वीडियो में भी बोला था, कि हमारी क्षमता दस के बारह तक की है, बारह के वो जो पांच सौ होंगे, उसका, वो कृपा करें।

वक्ता: वो ये है कि आप जान लें कि आप कितना भी जोर लगाएँगे तो आप बारह से आगे नहीं जाएँगे।  आप अगर दस पर अटके हैं और बहुत जोर लगा लिया, तो बारह हो जाएँगे।

ये ऐसी सी बात है कि कोई साइकिल चलाता हो, अभी उसकी गति है १५ कि. मी. प्रति घंटा, बहुत जोर लगा लेगा तो कितना पहुँच जाएगा? १५ का कितना कर लेगा? थोड़ा ज़ोर लगाएगा तो बीस कर लेगा, थोड़ा और लगाएगा तो २५ कर लेगा। जान ही लगा दी तो कितना कर लेगा? थोड़ी देर के लिए? ३० कर लेगा, अरे ५० कर लेगा। १० मिनट ५० की गति पर अगर साइकिल चला दी तो उसके बाद? दो दिन सोना होगा उसको !

और अगर लक्ष्य है सुपर सॉनिक  उड़ना, तो साइकिल से उतरना पड़ेगा। और ज़्यादा तेज़ पैडल मारने से, और तेज़ चलने से, साइकिल सुपरसोनिक साइकिल नहीं हो जाएगी। हमारी गलती यही है, हम जहाँ बैठे हैं हम वहीं बैठे रहना चाहते हैं, और हम चाहते हैं कि हमें थोड़ा सा, क्रमिक, मूल्यवर्धन मिल जाये, हम ज़रा से बेहतर हो जाएँ। और ज़रा से बेहतर हम हो भी जाते हैं। लेकिन जो आयामगत बढ़ोतरी है, वो हमें नहीं मिलेगी।

साइकिल तुम कितनी भी तेज़ चला लो, तुम आसमान में तो नहीं उड़ोगे ना !  साइकिल से मोह बंध गया है, साइकिल छोड़ने को राजी नहीं हैं। हम कहते हैं अब जियेंगे-मरेंगे तो जानेमन तेरे ही साथ। तुझी को लेकर सुपरसोनिक  उड़ जाएँगे। वो नहीं हो सकता ! साइकिल का नाम है आदत, साइकिल का नाम है वृत्ति, साइकिल का नाम है अहंता, साइकिल का नाम है जीवन के ढाँचे और ढर्रे। और उससे हमें बड़ी आसक्ति हो जाती है।

उन ढर्रों में थोड़ा सा तो होती है, लेकिन मुक्ति की गुंजाइश नहीं होती। लचीलेपन का मतलब समझते हो? तुम्हारे पजामे में इलास्टिक लगी हुई है, और तुम्हारी तोंद निकल आयी, तो पजामा तुरंत तो बदलना नहीं पड़ता ! थोड़ा सा वो चौड़ा हो जाता है, और तुम खुश हो जाते हो, कहते हो “देख!” पर अगर तुम्हें हाथी होना है तो पजामे की इलास्टिक काम आएगी? बोलो?

श्रोता: नहीं आएगी।

वक्ता: हाँ ! हम थोड़े से लचीलेपन कर को पा के खुश हो जाते हैं, बीस  प्रतिशत बढ़ गया ना, बस हो गया, और क्या चाहिये? दस-दस प्रतिशत की प्रगति भर से हम अघा जाते हैं कि खूब मिल गया। आध्यात्मिकता उनके लिए है जिन्हें दस प्रतिशत से संतोष नहीं करना, जो कहते हैं कि हमें तो कुछ और हो जाना है। जो साइकिल कार, बाइक, सब बेचने बाचने को, फेंकने को, तैयार हो गए हैं। कहते हैं, हटाओ ! साईकल से थोड़े ही यारी है, हमारी तो गति से यारी है, हमारी तो मंज़िल से यारी है। प्यारी क्या है? मंज़िल या वाहन?

और हम ये भूल कर बैठते हैं कि मंज़िल को पीछे रख देते हैं और साधन को, वाहन को आगे रख देते हैं। और जिनको मंज़िल से ज़्यादा मार्ग प्यारा हो जाता है, जिन्हें मंज़िल से ज़्यादा साधन और वाहन और विधि प्यारी हो जाती है, फिर उन्हें वही मिल जाता है जो उन्हें प्यारा है।

साइकिल रखो और धूल फांको, मंज़िल कभी नहीं मिलेगी।

मज़ेदार बात ये है कि साइकिल  पकड़ी ही क्यों थी? मंज़िल की मुहब्बत में ! अब साइकिल लिये रहो, जो पहला प्यार था वो पीछे छूट गया। जैसे कोई महबूबा से मिलने जाने के लिए शर्ट पहने और फिर शर्ट से प्यार करने लग जाए कि “क्या खूबसूरत शर्ट है। और इसे पहन के बाहर निकलूंगा वो पगली कहीं इस पर आईसक्रीम न गिरा दे, इतनी खूबसूरत शर्ट है। मिलने ही नहीं जाऊँगा। इतनी खूबसूरत शर्ट है, मिलने ही नहीं जाऊँगा।”



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: सहज और असहज संतुलन

निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

 

2 comments

    1. नमश्कार,

      यह सन्देश आप तक प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवियों के माध्यम से पहुँच रहा है, जो इस प्रोफाइल की देख-रेख करते हैं।

      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन की ओर से हार्दिक अभिनन्दन!

      यह बहुत ही शुभ है कि आप आचार्य जी के अमूल्य वचनों से लाभान्वित हो रहे हैं|

      फाउंडेशन बड़े हर्ष के साथ आपको सूचित करना चाहता है कि निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-
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      १. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
      यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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      २: अद्वैत बोध शिविर:
      अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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      ३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
      आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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      ४. जागरुकता का महीना:
      फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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      ५. आचार्य जी के साथ एक दिन
      ‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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      ६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
      ‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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      ७. परमचेतना नेतृत्व
      नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
      एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
      क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
      क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

      जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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      ८. स्टूडियो कबीर
      स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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      ९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
      यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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      १०. त्रियोग:
      त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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      ११. बोध-पुस्तक
      जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

      अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
      फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks
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      इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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      आशा है कि आप उपरोक्त माध्यमों के द्वारा आचार्य जी से बेहतर रूप से जुड़कर उनके आशीर्वचनों से कृतार्थ हो पायेंगे।

      सप्रेम,
      प्रशान्तअद्वैत फाउंडेशन

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