शान्ति वो आराम है जो निर्बाध्य रहता है, अक्षुण्ण रहता है, अविचल रहता है

एक मोटा आदमी कुर्सी पर बैठ के आराम कर रहा है। और एक स्वस्थ, सुडौल, मज़बूत काठी का छरहरा आदमी दूसरी कुर्सी पर बैठा हुआ है। समस्या दोनों को नहीं है ना। बाहर से देखने में ऐसा लगता है जैसे दोनों विश्राम में हैं। पर उनमें से एक शांत है और दूसरे को मात्र सुख है, सुविधा है, कम्फर्ट  है। प्रमाण इसका ये है कि शान्ति सावधिक नहीं होती, झट जाने को तैयार नहीं होती। और जिसको तुम सुख या सुविधा कहते हो, आराम कहते हो, वो बहुत तात्कालिक होता है, वो लगातार भागने को तैयार होता है। एक धोखा होता है वो।

तुम्हें लग रहा है कि सब ठीक है, पर तुम इतने मोटे हो कि तुम्हारे भीतर पाँच व्याधियाँ पनप रही हैं। तुम्हें लग भर रहा है कि सब ठीक है। और ऐसा नहीं कि भविष्य ही तुम्हारा भ्रम तोड़ेगा, ठीक अभी अगर तुम पहाड़ चढ़ने की कोशिश करो, तो तुम्हें दिख जाएगा कि तुम्हारा आराम झूठा है। आराम तुरंत बदल जाएगा, बेचैनी में। आराम तुरंत बदल जाएगा “हाय राम!” में। फिर तुम्हें पूछना होगा अभी तो आप कहते थे नहीं नहीं नहीं, हमें तो तोंद के साथ भी आराम है। अब, “हाय राम! हाय राम!” क्यों? न पहाड़ पर चढ़ते हो, न उतरते हो, कौन सा आराम है तुमको? समझ में आ रही है बात?

और शान्त आदमी, वो जिसको हमने कहा कि सुडौल है, सबल है, वो शान्ति में चढ़ जाएगा और शान्ति में ही उतर भी जाएगा, उसकी शान्ति निर्विघ्न रहेगी। अंतर समझ रहे हो ना?

तो, तुम कह सकते हो कि शान्ति वो आराम है जो निर्बाध्य रहता है, अक्षुण्ण रहता है, अविचल रहता है। हम जिन आरामों में रहते हैं वो आराम धोखेबाज़ी के हैं। क्योंकि वो अभी हैं और अभी होने के कारण ही वो अगले पल नहीं रहेंगे। वो अभी होने के कारण ही अगले पल नहीं रहेंगे। तुम्हें जो आराम मिला है उससे पूछना। धोखा देगा क्या? वो तुमसे आँख मिला कर न नहीं बोल पाएगा। कुछ ऐसा पाओ जो सदा का आराम दे जाए। जिसके बिछुड़ने की कोई सम्भावना ही न हो,तब मिला आराम। इसीलिए नींद वास्तविक आराम नहीं है क्योंकि वो? टूटेगी।

वास्तविक आराम को जानने वालों ने कहा है, जागृत शुषुप्ति। कि जग भी रहे हो तो ऐसा है कि सोये हुए हो। अब ऐसा आराम है कि सोये तो सोये, हम तो जगे में भी सोये। अब हमारा आराम अविरल है। अब तोड़ो हमारी नींद। तुम नींद तोड़ भी दोगे तो भी हम नींद में ही हैं। कभी नींद में नींद है, और कभी? जागे में नींद है। ये शान्ति है।

शान्ति वो, जो आती, जाती नहीं। शान्ति वो जो धोखा नहीं देती। तुम अगर कहो कि अभी शांत हूँ, थोड़ी देर में अशांत हो जाऊँगा, तो तुम्हारी शान्ति सिर्फ झूठा आराम थी। उस शान्ति के समपर्क में रहो, जिसे कोई हिला नहीं सकता। उसके चक्कर में फंस गए जिसे कोई भी हिला देता है, तो घनचक्कर हो जाओगे। जो कुछ भी तुम्हें सुख देता हो, तुम उसी से कहना, कि ठीक है तू सुख देता है, चल कुछ ऐसा उपाय करें कि ये सुख कभी छिने न। और उस उपाय में लग जाना, ईमानदारी से। अगर तुम्हारा सुख ऐसा हो सकता है कि कभी छिने ना, तो वो फिर सुख नहीं है, सत्य है। सुख मात्र नहीं है वो फिर, शाश्वत सत्य है। और अगर तुम्हारा सुख ऐसा  हो ही नहीं सकता कि कभी छिने ना, तो उस सुख को धूल और राख जान के झाड़ देना।