आदर्शवादी मत बन जाना

जो है जैसा है, यही है। देखो इसे, समझो इसे, और पार निकल जाओ इसके। आदर्श की प्रतीक्षा में रह गए, तो प्रतीक्षा मात्र मिलेगी। और उससे भी ज़्यादा खतरनाक होगा अगर आदर्श मिल गया। क्योंकि फिर तुम मुर्दा हो गए। आदर्शवादियों से ज़्यादा मुर्दा कोई नहीं होता। ये है आदर्श (टेबल को इंगित करते हुए)। आदर्श समझते हो ना? एक नमूना मन में था और उसके अनुसार कुछ तैयार कर दिया गया। ये जीवित नहीं है। इसका पहले से ही आदर्श नमूना किसी के मन में था। और उस कलाकार ने, बढ़ई ने, उस नमूने के अनुसार ये तैयार कर दिया, ये आदर्श है। ऐसा होना चाहते हो?

माँ बाप अक़सर यही करते हैं, उनके दिमाग में पहले से ही आदर्श नमूना होता है, लड़के को ऐसा तैयार करेंगे।

कई होते हैं, विद्यालय वगैरह जहाँ ये सब पढ़ाया जाता है – आदर्श राजू, आदर्श ललिता। और आदर्श राजू को बता दिया जाता है कि आदर्श लड़की ललिता जैसी होती है। और आदर्श लड़की को पहले ही पता है कि आदर्श लड़का माने राजू।  अब हो गया। सब मुर्दा।

पेड़ कभी ऐसा होता है?

पेड़ के पास कोई आदर्श है?

तुम पेड़ को सिखा सकते हो कि इसी तरीके से आगे बढ़ना है – यहीं से ही शाख फूटेगी, और फिर वहाँ से प्रशाख फूटेगी, और ठीक इतनी पत्तियाँ आएँगी तेरे ऊपर क्योंकि यही एक आदर्श संख्या है? पेड़ को बता सकते हो? 

वहाँ तो जो होता है, उसमें एक है, एक अव्यवस्था है, एक अराजकता है। जो बड़ी सुन्दर है। पूरी नहीं है वो भी, क्योंकि पेड़ उड़ नहीं सकता। एक आदर्श तो उसको भी पता है, क्या? कि जीना जड़ों में ही है, जीना जमीन पर ही है। पेड़ बोलेगा भी नहीं। कुछ बातों से वो भी सीमित है। आदर्श माने सीमा। लेकिन फिर भी पेड़ के पास, इससे (टेबल) तो ज़्यादा आज़ादी है ना?

आदर्शवादी मत बन जाना। क्यों चाहिये आदर्श? जब प्रतिपल तुम्हारे पास बोध है, जब तुम देख सकते हो, समझ सकते हो, तो उसके सहारे जियो ना! आदर्शों का सहारा क्यों चाहिए? गाड़ी चलाते हो तो आँख से चलाते हो या स्मृति से चलाते हो? आदर्श माने, स्मृति से जीना। गाड़ी कैसे चलाते हो? अभी सामने जो होगा, उसको तत्काल एक समुचित उत्तर देंगे।



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