विशुद्ध चेतना का नाम ही परमात्मा है।

आस्तिक सभी हैं, बस अपनी अपनी तरह के आस्तिक हैं। असली आस्तिक कोई नहीं है। सब? अपनी अपनी तरह के आस्तिक हैं। निर्वैयक्तिक आस्तिक कोई नहीं है। सबके पास आस्तिकता की व्यक्तिगत परिभाषाएँ हैं। असली आस्तिकता होती है जब सिर्फ वो बचे जो वास्तव में है, जिसका वास्तव में “अस्तित्व” है। तुम बचो ही न ये कहने के लिए कि “अस्ति” या “न अस्ति”। अस्तित्व मात्र बचे, तब हुए तुम आस्तिक। वो हुई विशुद्ध आस्तिकता। वैसे आस्तिक विरले होते हैं।

तुम तो अस्तित्व से अपने आप को काट के बोलते हो, “परमात्मा है।” “परमात्मा अस्ति, परमात्मा घूम रहा है वहाँ पर, घास के ऊपर, वो उधर, पूर्व दिशा में वहाँ खड़ा हुआ है,” ऐसे बोलोगे ‘अस्ति’? और थोड़ी देर में तुम्हें नहीं दिखा, तो बोलोगे, “न अस्ति”। ये आस्तिकता, नास्तिकता का खेल ही बचकाना है। तुम बात किसकी कर रहे हो? उसकी जिसकी बात ही नहीं की जा सकती! तुम हाँ या ना किसको बोल रहे हो? जो हाँ या ना दोनों के पार है! और तुम देख भी नहीं रहे कि हाँ या ना बोलने में बस एक की सत्ता को तुम स्वीकार कर रहे हो, किसकी सत्ता को? अपनी।

चलो ठीक है, कोई बात नहीं। तुमनें इतना तो मान लिया कि तुम हो? बस, तुम हो तो परमात्मा है; बात ख़त्म। क्योंकि तुम हो यदि, तो तुम्हारी झिलमिल ही सही, मिलावटी ही सही, अपूर्ण ही सही, चेतना तो है ना? उसी चेतना ने बोला ना? कि ये है और ये नहीं है। कितनी भी तुम्हारी मिलावटी चेतना हो, वो ये तो प्रमाण देती ही है, कि विशुद्ध चेतना भी हो सकती है। और विशुद्ध चेतना का नाम ही परमात्मा है।

गंदा जल भी तो गंगा जल का ही प्रमाण होता है। कि नहीं होता? अगर पानी गंदा हो सकता है तो? साफ़ भी होता ही होगा? तो तुम अगर बेवकूफी की बात कर सकते हो, कि ‘अस्ति’ या ‘न अस्ति’, तो पक्का है कि बोध भी कुछ होता ही होगा? अगर तुम इतनी अबोध बात कर रहे हो, कि परमात्मा है और परमात्मा नहीं है, दो जने ज्ञानी बैठ कर के, शास्त्रार्थ लड़ा रहे हैं । एक कह रहा है मैं आस्तिक, एक कह रहा है मैं नास्तिक – जब तुम इतनी अबोध बात कर सकते हो, तो फिर बोध भी ज़रूर होता होगा ।



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