जो बाहरी को बाहरी जाने उसे कहते हैं भीतरी।

अब ध्यान से समझना। जो बाहरी को बाहरी जाने उसे कहते हैं भीतरी। बाहरी जो कुछ है वो वस्तु है, पदार्थ है, विचार है, कल्पना है, छवि है, मानशिक कृति है। और, जैस जैसे तुम जानते जाते हो कि ये सब कुछ बाहरी है, उस जानने को कहते है भीतरी। जो भीतरी है वो कहीं स्थान में अवस्थित नहीं है। जैसे, तुम कहो कि एक मकान है और मकान के कुछ, बाहर होता है, कुछ, अन्दर होता है। नहीं, वो बात नहीं है, वो उदहारण मत पकड़ लेना। वो बिल्कुल तुम्हें गुमराह कर देगा।

सब बाहरी है। मकान के बाहर भी बाहर है। और जिसे तुम कहते हो मकान के भीतर की बात, वो भी बाहरी है। जो कुछ भी समय और स्थान में अवस्थित है, वो सब बाहरी है।

तुमने ऊँगली पर अंगूठी पहन रखी है, जिस दुकान से अंगूठी आई है वो दुकान बाहरी है।

अंगूठी भी बाहरी है।

जिस खाल पर अंगूठी है, वो खाल भी बाहरी है।

खाल के नीचे जो माँस है, वो भी बाहरी है।

माँस के नीचे जो हड्डी है, वो भी बाहरी है।

और, धमनियों में जो रक्त बह रहा है, वो भी बाहरी है।

और, रक्त का संचार करने वाला ह्रदय भी बाहरी है।

सब बाहरी ही बाहरी है।

भीतरी कौन है? वो, जो ये सब जानता है कि ये सब बाहरी है। हर दृश्य बाहरी है, इन सभी दृश्यों का जो निर्पेक्ष द्रष्टा है, मात्र वो भीतरी है। और उसकी बात करना व्यर्थ है, क्योंकि वो द्रष्टा है, दृश्य नहीं है। जब वो दृश्य नहीं है तो तुमने उसे कैसे देख लिया?



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