हर वेला अमृतवेला है, लगातार नाम लेना है।

दिन कभी रात को नहीं जानता, रात कभी दिन को नहीं जानती। पर एक बिंदु होता है जहाँ रात और दिन, गले मिलते हैं। वो ब्रह्ममुहूर्त होता है। वो, वो बिंदु होता है जहाँ पर द्वैत के दो सिरे, एक क्षण के लिये, करीब आ जाते हैं। याद रखना, रात में ऐसा कुछ नहीं होता, जो ये सूचना दे कि दिन आने को है। रात, रात होती है। तुम रात को देखो, कहीं से तुम्हें दिन नहीं दिखाई देगा। और अभी दिन है, दिन में कहीं रात की झलक नहीं है। अप्रत्याशित घटना घट जाती है, जादू हो जाता है। रात की कोख से दिन निकल आया! ये कैसे हो गया? यही ब्रह्म का काम है। यही जादू है। समझ रहे हो? अकारण कुछ हो गया ना? कोई कारण है, कि अँधेरे में से, उजाला निकल पड़े? अकारण कुछ हो गया। इस कारण, वो ब्रम्हवेला बड़ी महत्वपूर्ण मानी गयी है। और दूसरे कारण, तो हैं ही कि सो कर के उठते हो, मन तजा रहता है, थकान कम रहती है। वो सब लेकिन बाद की बातें हैं।

ये जो परंपरा रही है कि सुबह और साँझ पूजा की जाए। उसके पीछे, समझ यही रही है कि ये दोनों संधि काल होते हैं। जब दो विपरीत ध्रुव, मिलते से होते हैं। आ रही है बात समझ में? इसका ये नहीं अर्थ है कि सुबह नाम लेकर खतम करो। मन पता नही..। नानक ने कहा था कि अमृतवेला में नाम लेना, तो ले लिया अमृतवेला में। अब दिन भर हमें जो करना है सो कर रहें हैं – इसका ये अर्थ न कर लेना। हर वेला, अमृतवेला है। लगातार नाम लेना है।



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