गुरु है ही वो जिसका मौन, शब्द रूप में उच्चारित होता हो

गुरु की परिभाषा ही यही है – गुरु है ही वो जिसका मौन, शब्द रूप में उच्चारित होता हो, वही गुरु है। जो भी आप कहते हैं, वो दो जगहों से आ सकता है – या तो आपकी स्मृति से आ सकता है, या उस विराट शून्य से आ सकता है जिसे हम मौन कहते हैं। स्मृति से कोई भी पढ़ा लेगा, हर आम शिक्षक का यही काम है।

गुरु वो, जो जनता ही नहीं है कि उसे बोलना क्या है। वो इतनी गहरी श्रद्धा में, ऐसे समर्पण में है कि वो बस चुप हो जाता है। सर झुका देता है। और कहता है कि अब बहे जो बहना है। ध्यान रखिये, बड़ी हिम्मत का काम है ये। जब आप ध्वनियों से स्वयं को काट करके भीतर प्रवेश करते हैं, तो वहाँ कम से कम आपको अकेलेपन की सान्तवना मिलती है। जो भी कुछ होगा, उसपर कोई प्रश्नचिन्ह लगाने वाला नहीं है। जो भी कुछ होगा, उसे कोई देखने वाला नहीं है। जो हो रहा है, सो आपका है, आतंरिक है।

लेकिन, बड़ा साहस चाहिये, अहंकार की दृष्टि से कहूँ तो बड़ा दुस्साहस चाहिये एक भीड़ के समक्ष मौन हो जाने में। एक बंद कमरे में आप योग की कोई प्रक्रिया कर रहें हैं, आप ध्यानस्थ होना चाहते हैं, वहाँ आप कुछ भी करिये, नितांत निजी मामला है। आपके सम्मान को, आपकी छवि को कोई चोट लगने की कोई संभावना नहीं है। लेकिन दूसरों के समक्ष। और याद रखियेगा, मन के लिये दूसरे सब कुछ होते हैं क्योंकि मन पलता ही दूसरों से है। लेकिन दूसरों के समक्ष अपने आप को ये अनुमति दे पाना कि जो होता हो सो हो, मैं अपने साथ कोई अस्त्र लेकर के नहीं आया हूँ। मैं बस प्रस्तुत हूँ। अब जो होता हो सो हो। ये साधू का ही काम है।



पूर्ण  लेख पढ़ें: डूब के जानो, झूम के गाओ