जितना तुम अपने आप को बचाते हो, तुम अपने दुःख को बचाते हो।

ओशो जब आपसे कह रहे हैं कि डर का स्वागत करो, और पीड़ा का स्वागत करो, और जीवन के तमाम उतार चढ़ावों का स्वागत करो; तो वो वस्तुतः आपसे ये कह रहे हैं कि जितने तरह के दूषण हो सकते हैं, विकार हो सकते हैं, मलिनताएँ हो सकती हैं, उन सब से मिलते चलो, क्योंकि उनसे मिलने के बाद ही वो मिलता है जो निर्मल कर देता है, और निर्दोष कर देता है, और निर्विकार कर देता है। ये विचित्र है ज़रा सा, पर ऐसा ही है कि कोई मौजूद है आपको डर से बचाने के लिए, ये आपको सिर्फ तब पता चलेगा, जब आपको गहरा डर उठेगा!

कोई मौजूद है आपको गिरने से, और दुर्घटना से, और चोट से बचाने के लिए, ये आपको सिर्फ तब पता चलेगा, जब आप दुर्घटना के क्षण में होंगे, और जब आप गिर रहे होंगे। श्रद्धा और जगती कैसे है? ऐसे ही तो! गिर रहे होते हैं, गिर रहे होते हैं, आप गिर रहे होते हैं, तो अतल गहराई है, और अचानक जैसे दो हाथ आपको थाम लेते हैं, अब ना पता चलेगा कि अकारण, अजन्मे, अनजाने, अनर्जित, दो हाथ, न जाने कहाँ से आके आपको बचा सकते हैं। अरे, बचाएँगे तो तब ना, जब पहले तुम नष्ट होने के लिए तैयार हो? जब नष्ट होने की घड़ी आएगी, तभी तो ये जानोगे ना? कि नष्ट होके भी नष्ट नहीं हुए। तभी तो अपनी अमरता का पता चलेगा, तभी तो अपनी ताकत का पता चलेगा! तभी तो बचाने वाले के जलाल का पता चलेगा!

तुम खुद ही अपने आप को बचाए बैठे हो, तो और कौन बचाएगा? तब तो तुम ही अपने हो गए परमात्मा! ये अलग बात है कि जितना तुम अपने आप को बचाते हो, तुम अपने दुःख को बचाते हो। संतों ने सदा समझाया है, नष्ट हो जाने दो अपने आप को, उसके बाद देखना कि बचे की नहीं। जो कुछ भी नष्ट हो सकता है, उसे हो ही जाने दो नष्ट। उसके बाद देखना कि क्या बचता है? 



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