पूर्व जन्म में आपका जो कुछ भी है, उसे देह कहते हैं।

पूर्व जन्म में आपका जो कुछ भी है, उसे देह कहते हैं। पहले से आप जो कुछ भी ले कर के आये हो, उसको देह कहते हैं। एक तो ये कि क्या खाया, किस माहौल में रहे, मन कैसा रखा? व्यायाम किया कि नहीं किया? और दूसरा होता है देह का बीज, देह की अभियोजना, देह की जो मूल परिकल्पना है। जो उसकी मूल रचना है, समझ रहे हो? उदाहरण के लिए, ये जो आपकी नाक है, इसका आकार, इसकी आकृति, ये आप ले के पैदा हुए हो। आप कर लो कितनी भी कसरत आप नाक नहीं बदल सकते अपनी। सत्यम भी नहीं बदल सकता, कितनी भी दौड़ लगा ले।

तो, आप, कुछ है जो ले कर के पैदा हो रहे हो। कुछ है जो आप ले कर के पैदा ही हो रहे हो। उसी को ओशो कह रहे हैं कि पूर्व जनम में अगर आपके गहरे अनुभव रहे हैं तो, इस जनम में अपेक्षतया सरलता से आप मुक्ति पा सकते हो। ऊर्ध्वगमन हो सकता है। ऊर्ध्वगमन माने, मुक्ति की तरफ बढ़ना। शब्दों में मत पड़ियेगा। ऊर्ध्वगमन माने? मुक्ति की तरफ बढ़ना। अधोगमन माने? ग़ुलामी की तरफ बढ़ना, और कुछ भी नहीं। आप अपनी वृत्ति में ही और लिप्त होते जाएँ, तो ये क्या हुआ? गिरना। गिरना माने? अधोगमन।

और आप आज़ादी की तरफ बढ़ रहे हो, तो ये क्या हुआ? ऊर्ध्वगमन। ऊर्ध्वगमन माने उठना, कि जैसे कोई पृथ्वी के आकर्षण से उठ कर के, आकाश में तैरना शुरू कर दे। ये ऊर्ध्वगमन हुआ। इतना ही है।

तो, कुछ लोग पैदा ही होते हैं, बड़ी घनी वृत्तियों के साथ। सागर में कुछ लहरें उठती हैं एक आकार की, कुछ लहरें उठती हैं दूसरे आकार की। कुछ पैदा होते हैं, दूसरे प्रकार की वृत्तियों के साथ। ऐसा बिलकुल होता है, कि कुछ लोगों के लिए, कुछ बातें अपेक्षाकृत आसान होती हैं, कुछ लोगों के लिए ज़रा मुश्किल होती हैं। लेकिन बस अपेक्षाकृत तरीके से। क्योंकि यदि पैदा हुए हो, तो ‘अहम्’ के साथ तो पैदा हुए ही हो। आयाम का अंतर नहीं है। अहम् तो है ही। परिमाण का अंतर हो सकता है, मात्रा का अंतर हो सकता है। पर चीज़ वही है। कितनी है, इसमें अंतर हो सकता है।

तो, जो भी पैदा हुआ है, उसे वृत्तियों से, वासनाओं से, इच्छाओं से, भ्रमों से, और बेचैनी से तो पार पाना ही पड़ेगा! हाँ, उसके सामने उसकी व्यक्तिगत चुनौतियाँ कैसी आती हैं, ये उसकी वृत्तियों पर और संयोगों पर निर्भर करेगा।



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