जहाँ डर है, वहाँ प्रेम नहीं।

जहाँ डर है, वहाँ प्रेम नहीं। जहाँ डर है वहाँ सत्य नहीं। जहाँ डर है, वहाँ मुक्ति नहीं। कोई बहुत डरा हुआ है, वो आपसे बंध ही जाएगा, चिपक ही जाएगा। इसीलिए नहीं कि उसे प्रेम है आपसे, स्वार्थवश। किसी से प्रेम में एक हो जाना बिलकुल अलग बात है, और अपने डर की वजह से, अपने स्वार्थ की वजह से, किसी को जकड़ लेना बिलकुल दूसरी बात है। तो, फ़रीद हमें समझा रहे हैं कि जो डरा हुआ है, उससे बचो। क्योंकि वो घातक है, नुकसानदेह है।

डर अनायास नहीं होता, डर अकारण नहीं होता, डर के पीछे हमेशा एक चुनाव होता है। क्या चुनाव? कि सच्चाई नहीं चाहिए, झूठ ज़्यादा पसंद है। समर्पण नहीं चाहिए, अकड़ में जीना है। डर बीमारी है, ऐसी बीमारी जिसे हम खुद पैदा करते हैं, पोसते हैं, और सुरक्षित रखते हैं। जो सरल चित्त हैं, उन्हें डर कहाँ? डर कभी अकेला नहीं चलता। भय के साथ बीमारियों का पूरा एक कुनबा चलता है। जहाँ डर देखो, समझ लेना वहाँ भ्रम है, क्रोध है, मोह है, मद है, मात्सर्य है। तमाम तरह के झूठ हैं।

बीमारियों के इस झुंड से बचना है, कि नहीं बचना है?

यही समझा रहे हैं शेख फरीद कि डरे हुए आदमी को व्याधियों का झुण्ड जानना। सतर्क हो जाना, वो व्याधियाँ तुम्हें भी लग सकती हैं। जितनी मानसिक बीमारियाँ हैं, सब अतिसंक्रामक होती हैं। संगत असर लाती है, डरे हुए के बगल में बैठोगे, तुम भी डर जाओगे। वो तुम्हें ऐसे किससे सुनेगा, तुम्हारे मन में ऐसे-ऐसे ख़याल भर देगा जो तुम्हें अन्यथा कभी आते नहीं। तुम मौज में घूम रहे थे, वो तुम्हारे दिमाग में दस भूत नचा देगा, तुम भी डर जाओगे। संक्रामक है डर। तो फ़रीद कह रहे हैं, इस संक्रमण के विरुद्ध सतर्क रहो, अपनी रक्षा करो।

तुम अपनी रक्षा कर पाओगे, तभी तो किसी और की करोगे ना? जो खुद हार गया, वो किसी और को क्या जिताएगा? जो खुद बीमार हो गया, वो दूसरों की क्या चिकित्सा करेगा? अपने आप को बचाओ, यही दूसरे के प्रति भी करुणा है। जो मुक्त है, उसी का स्पर्श दूसरों को मुक्ति दे सकता है। जो आनंद में है, उसी का साहचर्य दूसरों को आनंदित कर सकता है।



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