विरही मन एक ही दिशा भागता है, अंतर्दिशा

विक्षिप्त आदमी की पहचान यही है कि वो दस तरफ दौड़ेगा, पागल को कभी देखा है, नहीं चल पाता सीधी राह। आप भी अगर पाते हैं, कि दस तरफ दौड़ते हैं, कभी इधर को आकर्षित होते हैं, कभी उधर को भागते हैं, कभी इधर से डरते हैं, कभी उधर का लालच आता है, ये विक्षिप्तता की निशानी है। आपको नहीं पता कि आपको कहाँ जाना है, इसीलिए आप दस दिशा भागते फिरते हैं। विक्षिप्त आदमी अंधाधुंध भागता है, और हर दिशा भागता है। जहाँ से ही उसे कोई उम्मीद बंधती है कि सुख मिलेगा, वहाँ भागता है। आप उसे कहिये, मौका आया है, कुछ पैसे कमाने का, उधर को भाग लेगा। आप कहिये, कहीं कुछ मौका आया है, मुनाफा बनाने का, वो भाग लेगा। उसे गुलाम बनाना बड़ा आसान है। थोड़ा सा डर दिखाईये, थोड़ा सा लालच दिखाईये, चल देगा आपके पीछे। बिखरी बिखरी सी उसकी चाल होगी।

विरही मन भी खूब भागता है, पर वो अब दस दिशा नहीं भागता, वो एक दिशा भागता है। विक्षिप्त मन की सारी दिशाएँ संसार की होती है, और विरही मन, एक ग्यारहवीं दिशा की और भागता है, अंतर्दिशा। विक्षिप्त आदमी चारों तरफ भाग रहा है, दसों दिशाएँ। विरही भी भागता है, पर संसार में अपनी दिशा नहीं खोजता, वो भीतर दिशा खोजता है।



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