आप मौन रहें, सत्य स्वयं बोलेगा।

ये सवाल व्यर्थ है कि सत्य मिल जाए तो क्या करें? सत्य मिल जाएगा तो तुम्हें कुछ करना ही नहीं है, जो करेगा सत्य करेगा। अगर सत्य मिल गया, और अभी भी तुम कुछ कर रहे हो, तो क्या मिला? तो, ये सवाल कि सत्य मिल जाए तो उसके बाद चुप रहें या औरों को बताएँ, ये सवाल फ़िज़ूल है।सत्य जिन्हें मिलता है, उसके बाद जो करना होता है सत्य खुद कर लेता है, आपको नहीं करना है। चुप रहने को आपको कहा गया है। चुप रहने को आपको कहा गया है, सच को बोलने दीजिये, आप चुप रहिये, इतनी सी बात।

आप बोलेंगे, अपना ही नुकसान करेंगे, औरों का भी नुकसान करेंगे। आप बोलने से रोकेंगे अपने आप को, तो भी नुकसान करेंगे। सवाल, फिर न ‘बोलने’ का होगा, न ‘न बोलने’ का, सवाल होगा कि “आप क्यों कर्ता बने हुए हो?” आपको कर्ता नहीं बनना है। चुप रहना यही है। आप मौन रहें, सत्य स्वयं बोलेगा। उसके पास बहुत तरीके हैं। आप जैसा बोल सकते हैं, उससे वो बहुत अच्छा बोलेगा, बहुत सुंदर बोलेगा, बहुत उचित बोलेगा।



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