कहानी तो कही जा रही है, हमें सुननी नहीं आती

ये पक्षी ऐसे ही नहीं गाते। जो आवाज़ आ रही है चिड़िया की वो फ़ालतू ही नहीं है। वो कुछ अभिव्यक्त कर रही है। क्या? कुछ विशेष नहीं। भाषा नहीं है उसके पास। या ये कह लो कि नियम कायदों में बंधी हुई भाषा नहीं है उसके पास। पर वो जो बता रही है, वो समूचे अस्तित्व की कहानी है। तुमको सुनना नहीं आता, ये अलग बात है। कहानी तो कही जा रही है, हमें सुननी नहीं आती, सो अलग बात है।

उसको बेज़ुबान मत कह देना, उसको बेदिमाग मत कह देना, किसी भी अर्थ में उसको हीन मत समझ लेना, उसको सब पता है। और उसको इतनी गहराई से पता है, कि उसे उस बारे में अब विचार नहीं करना पड़ता। यहाँ तक कि, तुम उससे अगर पूछोगे, कि तुझे क्या पता है? तो वो बता भी नहीं पाएगी कि उसे क्या पता है। क्योंकि उसको जो पता है, वो अब उसकी मांस-मज्जा बन गया है, वो उसके रेशे रेशे में समा गया है। इतनी गहराई से पता है कि अभिव्यक्ति अब सम्भव ही नहीं रही।

तुम्हें भी जब वास्तव में कुछ पता चल जाएगा, तो अभिव्यक्ति सम्भव ही नहीं रहेगी। क्योंकि तुम्हें पता नहीं होता है, इसीलिए तुम बोल पाते हो कि मुझे पता है। याद रखना तुम अभिव्यक्त उसको ही कर पाओगे जो अभी आधा अधूरा पता है। जब पूरा पता चल जाएगा तो तुम भूल जाओगे कि तुम्हें पता है। जब पूरा जान जाओगे, तब बिलकुल स्मरण नहीं आएगा कि जानते हो। पूरी प्रकृति उसी स्थिति में है। वो इतनी ज़्यादा जानती है, और इतनी गहराई से जानती है, और इतनी क़रीबी से जानती है, कि उसको अब स्मरण भी नहीं है, उसको अब विचार भी नहीं है कि हम जानते हैं।

तुम पूछोगे यदि, ये सामने छोटा सा पौधा है, कि तू क्या जानता है? वो तुमको कुछ बता नहीं पाएगा, शब्दों में नहीं बता पाएगा। हाँ, उसका होना ही पूरी कहानी कह रहा है इस बात की कि उसको क्या पता है। वो संतुष्ट है, वो समाधिस्त है। उसके होने को पढ़ सको तो बिलकुल जान जाओगे कि उसको क्या पता है। उससे भाषा में पूछोगे कि तुझे क्या पता है, वो नहीं बता पाएगा। उसके होने को पढ़ लिया, तो सब स्पष्ट है।



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