रोज़ अज़ल दा

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मैनूं लगड़ा इश्क़ अवलड़ा

अव्वल दा, रोज़ अज़ल दा।

विच कड़ाही तिल-तिल पावे,

तलिआं नूं चा तलदा।

मोइआं नूं एह वल-वल मारे,

दलियां नूं एह दलदा।

की जाणां कोई चिणग कखी ए,

नित सूल कलेजे सलदा।

बुल्ल्हा, शौह दा न्योंह अनोखा,

ओह नहीं रलाइआं रलदा।

बुल्ले शाह

 

श्रोता: मुझे ऐसा लगता है कि मेरे हाथ में एक छोटा खिलौना है और मैं  उस छोटे खिलौने को जब तक नहीं छोडूंगा तब तक जो बड़ा खिलौना है वो मेरे हाथ नहीं आ सकता। अगर मुझसे छोटा खिलौना छुड़वाना भी है तो मुझे बड़े वाले खिलौने का लालच देना होगा।

आचार्य प्रशांत ये तो बिलकुल पक्का है कि अभी हाथ में खिलौने हैं, उन्हीं से काम चल रहा है। एक आम इंसान होता है, उसकी ज़िंदगी और कुछ नहीं है, खिलौनों को लगातार बदलने की कहानी है। एक खिलौने से अगले खिलौने की और भागो। अगले से उसके अगले की ओर। जो न मिले वो और महत्वपूर्ण खिलौना हो गया। और ज़ोर लगाओ, उपाय, जुगत लगाओ। तो ये जो इंसान है जो खिलौनों की ही भाषा जानता है, इसको यही कहना पड़ेगा कि तुझे इससे बेहतर कोई खिलौना मिल जाएगा। उसे और कुछ पता नहीं है।

तो, उससे कहना तो यही पड़ेगा कि तुझे छोटे खिलौने से कहीं ज़्यादा आकर्षक कोई और खिलौना मिल जाएगा। आप उससे कोई और बात करोगे, वो राज़ी नहीं हो पायेगा। तो, ये जो घटना घटती है, जिसको हम खिलौनों का प्रतीक ले कर देख रहे हैं, इसमें दो छोर हैं। एक वो मन जो अभी घटना के प्रारम्भ में है। उस मन को बिलकुल यही कहना पड़ेगा कि छोटा खिलौना छोड़, बड़े की तालाश में जा। लेकिन इस घटना के दूसरे छोर पर वो मन है, जो घटना के प्रारम्भ में नहीं, अंत में है। वो, वो मन नहीं है जिसे बड़ा खिलौना मिल गया है, बात पर ध्यान देना। घटना के प्रारम्भ में तुमसे कहना यही पड़ेगा कि छोटा खिलौना छोड़ो। मैं तुम्हें…

श्रोता: बड़ा खिलौना दूंगा।

आचार्य जी: लेकिन कोई ये न समझे कि घटना के अंत में कोई बड़ा खिलौना तुम्हें मिल गया होगा। जब घटना का अंत होता है, तो तुम्हें बड़ा खिलौना नहीं मिला होता है। तुम्हें तुम्हारा स्वरुप मिला होता है, और ये ज्ञान मिला होता है कि मैं वो हूँ जिसे किसी खिलौने की ज़रुरत नहीं।

अंतर समझना – ये नहीं हुआ है कि तुम, तुम रहे हो, और तुम्हें एक बड़ा खिलौना मिल गया है। फिर तो ये लालच की बात है। फिर तो ये लालच की बात है कि छोटे से, बड़े खिलौने की और चले गए और तुम कायम रहे। तुम ही तो हो ना जिसे छोटा अच्छा लगता था, और बड़ा छोटे से ज़्यादा अच्छा लगता था। ये तो तुम्हीं हो ना? नहीं, ये नहीं घटा है।

वो मन जो खिलौने चाहता था, उस मन को कुछ पता चल गया है, अपने बारे में। क्या पता चल गया है? कि मुझे खिलौनों की ज़रुरत नहीं। ये दो बाते हुईं, वो दो बातें, अलग-अलग सिरों की बातें हैं। घटना के शुरू में निःसंदेह यही कहना पड़ेगा कि बड़ा खिलौना है, और तुम्हें मिलेगा। लेकिन घटना का जब अंत होता है, तो तुम ये नहीं पाते कि तुम्हारे हाथ में कोई बड़ा खिलौना है। क्योंकि अगर तुम्हारे हाथ में बड़ा खिलौना है, तो तुम वही रहे, और तुम्हारे हाथ वही रहे जो छोटा खिलौना पकड़ते थे। फिर तो कुछ घटा ही नहीं! कोई घटना घटी ही नहीं। जब घटना घटती है, तो खिलौना नहीं बदलता, तुम और तुम्हारे हाथ बदल जाते हैं। वो मन बदल जाता है जिसे खिलौने की ख्वाहिश थी। तुम्हें खिलौना नहीं मिलता, तुम्हें तुम मिल जाते हो। तुम्हें अपने स्वरुप का ज्ञान हो जाता है, आत्मबोध।

तो कह सकते हो कि इसमें एक तरह की धोखाधड़ी है, कहा जा सकता है। क्यों? क्योंकि तुमसे कहा तो गया था कि?

श्रोतागण: बड़ा खिलौना मिलेगा।

आचार्य जी: बड़ा खिलौना मिलेगा। बड़ा मिला तो नहीं। बड़ा तो नहीं मिला, छोटा भी गया। और छोटा ही नहीं गया, धोखे की इंतेहा ये हो गयी, कि तुम भी गए। अभी कम से कम इतना तो था, कि तुम थे, और छोटा खिलौना था, और भविष्य में बड़े बड़े खिलौनों की उम्मीद थी और सपने थे। सपने गए, छोटा खिलौना गया, और इंतेहा ये हुई कि तुम भी गए।

वो बचा जो अब मुस्कुरा रहा है, कहाँ खिलौनों में फँसा हुआ था? मैं और खिलौने? मुझे कहाँ खिलौनों की ज़रुरत है। सिर्फ वही, उसकी मौन मुस्कुराहट शेष रह जाती है। ये क्या कर रहा था मैं? बस वही रह जाता है।



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत, संत बुल्ले शाह पर: रोज़ अज़ल दा (The agony of Love)

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अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

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