जो होश में है उसे एक दिखता है, सीधा रास्ता

जो होश में है उसे एक दिखता है, सीधा रास्ता। उसके मन में  वैकल्पिक विचार आते ही नहीं। और इससे बड़ा आनंद नहीं हो सकता कि तुम्हारे मन में इधर-उधर के फ़ालतू विचार उठे ही नहीं। विचार उठा, फिर तुमने उसे संघर्ष करके उसे दबा दिया, उसमें कोई मज़ा नहीं। व्यर्थ विचार उठे, और तुम्हें उनसे संघर्ष करना पड़ा, और दमन कर दिया, ये तो अपनी ही ऊर्जा का क्षय है।

आध्यात्म का मज़ा इसमें है, कि बेवकूफी की बात मन में उठती ही नहीं है। ये आया मज़ा। अब डर लग रहा है, लग रहा है, और तुम डर के खिलाफ लड़े जा रहे हो, इसमें क्या मज़ा है। आध्यात्म का मज़ा इसमें है कि डर उठा ही नहीं। अब है मज़ा। द्वन्द है ही नहीं। निर्णय लेने ही नहीं पड़ रहे। क्यों? क्योंकि निर्णय लिया जा चुका है। निर्णय तो तब लेने पड़े ना जब कई विकल्प मौजूद हों। “हमें कई विकल्प दिखते ही नहीं, हमें तो एक राह दिखती है, उसके अलावा हमे कुछ दिखता ही नहीं।”



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