मौन सदैव है

मौन सदैव है। ये न कहिये कि जब मन नहीं तब मौन है। जब मन है तब मन के लिए बस मन है। मौन तो सदा है ही। वो मन को उपलब्ध नहीं, या मन को उसकी प्रतीति नहीं, तो वो चला नहीं गया। ऐसे समझिये कि आप मेरे शब्द को भी इसीलिए सुन पा रहे हैं, क्योंकि उसके पीछे मौन है। तो मन की दुनिया का आधार भी मौन ही है। मौन कहीं चला नहीं जाता मन के होने से। बस, मन इतना मूढ़ होता है कि वो सोचता है, शब्द भर है, मौन कहाँ है? वो ये भूल जाता है कि शब्द सुनाई कैसे देगा, यदि शब्द के पीछे मौन न हो। इसको आप मन की मूढ़ता भी कह सकते हैं, और मजबूरी भी कह सकते हैं। उसका सारा ढांचा, मात्र हलचल को पकड़ने के लिए तैयार किया गया है। जहाँ हलचल नहीं है, वहाँ मन को लगता है कुछ है ही नहीं। मौन हलचल नहीं है, तो मन मौन को पकड़ नहीं पाता, जब कि मन की सभी हलचलों का आधार भी मौन ही है।

ये कभी मत सोचियेगा, कि दो अलग-अलग हिस्से हैं अस्तित्व के – मन और सत्य। और जब मन की हलचल रुकती है, तब सत्य शुरू होता है, और जहाँ संसार है, वहाँ सत्य नहीं है। ऐसा बिलकुल नहीं है।

संसार का स्रोत, संसार की बुनियाद भी सत्य ही है। और, जगा हुआ, शांत मन, मौन मन, वही है जो देखे भले ही संसार को,  पर दिखाई उसे सत्य ही दे। जो सुने शब्द को, पर सुनाई उसे मौन ही दे – सो है जगा हुआ मन। आत्मा के छोर से देखें तो आप कहेंगे कि ये जगा हुआ मन है। दुनिया के छोर से देखें, तो आप कहेंगे, “ये मिटा हुआ मन है।” मिटा हुआ मन बोलो, चाहे जगा हुआ मन बोलो, बात एक ही है। मिटा हुआ मन ही जगा हुआ मन है। तुम मिट मिट कर ही जगते हो। जो मिटने को तैयार नहीं, वो कभी जाग नहीं पायेगा। समझ में आ रही है बात?

सत्य की ओर से देखो, तो जागृति है – सत्य में विलय, मन जा मिला स्रोत से। और दुनिया की ओर से देखो तो मौत है, ख़त्म हो गया बेचारा, कुछ नहीं है। दुनिया की नज़र में जो मिट जाना है, ख़त्म हो जाना है, वो यदि सत्य पर स्थापित हो कर देखो, तो जी उठना है, परम जागृति है। अंतर, दृष्टि का है। अंतर इसका है कि कहाँ से देख रहे हो, कौन देख रहा है। दुनिया की नज़र से देखोगे तो मौन का अर्थ है निष्क्रियता, न होना, हस्ती का ही विलुप्त हो जाना। केंद्र पर बैठ कर के देखोगे तो मौन है गहन आनंद, प्रेम की अनुभूति, गहरे से गहरा जुड़ाव।



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