जो भीतर से बहुत गरीब न हो, वो बाहर इतना पैसा नहीं इकठ्ठा कर सकता।

तुमने हज़ार शर्ट इकट्ठा कर रखी हैं, और चौंकना मत लोग होते हैं जिनके पास एक शून्य शून्य शून्य, एक हज़ार कपड़े भी होते हैं। स्त्रियाँ होती हैं जिनके पास जूतियों के शायद तीस, चालीस जोड़े होंगे। अब ये महत्वपूर्ण नहीं है कि वो तीस-चालीस तुमने किसको दिए, महत्वपूर्ण ये है कि खुद मुक्त हो जाओ, फेंक दो, किसी को मिलने होंगे तो उसके सर पर जाकर के गिरेंगे, वो ले लेगा। अस्तित्व जाने किसको मिले? तुम नदी में बहा दो, किसी को मिलने होंगे तो नाव से उठा लेगा। ये फ़िक्र किसी और पर छोड़ो। क्योंकि ये फ़िक्र अगर तुमने की तो समझ रहे हो ना क्या होगा? मैंने जूते तो छोड़ दिए और उससे ज्यादा बड़ा ज़हर इकठ्ठा कर लिया।

जगत की भलाई की बात छोड़ो, अभी हम थोड़ी देर पहले चर्चा कर रहे थे कि दूसरों तक बात कैसे पहुंचाएँ? इमानदारी की बात क्या है?

तुम्हें प्रेम है किसी से ओर तुम उसे बीमार देख रहे हो, तो तड़प कौन रहा है? कौन तड़प रहा है? तुम तड़प रहे हो ना। तो उसका अगर तुम इलाज करते हो, तो किस पर एहसान कर रहे हो? अपने पर कर रहे हो ना। तो ये रवैया ही क्यों कि किसी और का भला करना है? “मैं तो जगत के कल्याण हेतु पैदा हुआ हूँ।” भाई अगर प्यार है, और जिससे प्यार करते हो उसको कष्ट में और बेहोशी में, इग्नोरेंस  में देख रहे हो तो तुम्हें बुरा लग रहा है ना? नहीं लग रहा?

तुम चाहते हो जिससे प्यार करते हो, वो नशे में झूमता रहे, गड्ढों में गिरता रहे, चोट खाता रहे? दुखी रहे? वो दुखी है तो तुम दुखी हो। तुम अपने दुःख का इलाज कर रहे हो, और ये भूलना नहीं किसी पर एहसान नहीं किया जा रहा है, किसी पर एहसान नहीं किया जा रहा है।

हाँ तुम जिसको दो, उसके मन में अनुग्रह उठे, वो तुम्हें धन्यवाद दे, ये उसकी अपनी कहानी है, तुम अपेक्षा मत करना।

तुम्हारे पास सौ जोड़ी जूते थे, तुमने उछाल के फेंके, वो किसी के सर पे जाके गिरे, उसको ज़रुरत थी, उसने ले लिए, ओर उसने कहा धन्यवाद, तुम मत खुश होने लगना, कि तुम्हें धन्यवाद बोला। तुम्हें नहीं धन्यवाद बोला, एक दाता है, उसको धन्यवाद बोला है। तुम माध्यम थे। तुम तो माध्यम थे, तुम अगर इतने ही होशियार होते कि सुपात्र चुन सकते, तो तुम पहले संग्रह ही क्यों करते? पर हमारा तर्क देखो, पहले तो हमने सालों तक अनाप-शनाप तरीकों से दौलत इकठ्ठा करी, ओर अब हम क्या कर रहे हैं? हम एक फाउंडेशन बना रहे हैं जो उचित कैंडिडेट ढूंढता है, कि दान किसको दिया जाए। तुममें अगर इतनी ही योग्यता होती सुपात्र ढूँढने की, तुम इतने ही अगर समझदार होते, तो तुम्हारे पास इतना पैसा क्यों इकठ्ठा होता?

बड़ी-बड़ी फाउंडेशन चल रही हैं आजकल जो काम ही यही करती हैं, कि हमें दान देना है, डोनेट  करना है, तो हम ज़रा खोज कर रहे हैं कि कौन से योग्य लोग हैं जिन तक हमारा पैसा पहुंचे। बेवकूफ। तुम योग्य की खोज करोगे? पैमाने तो तुम्हारे ही होंगे ना योग्यता के? तुम्ही तो फैसला करोगे ना कौन योग्य है? तुममें है अक्ल फैसला करने की? और अक्ल होती तो तुम ये अरबों इकठ्ठा कर के बैठ जाते? बताओ? अमीरी बिमारी है। मनोविकारी स्थिथि है, “इकठा करो, इकठ्ठा करो, इकठ्ठा करो।”

जिस दिन इस धरती पर आदमी थोड़ा और चैतन्य होगा, उस दिन ये जितने लोग हैं जिन्होंने इकठ्ठा कर रखा है, इनका इलाज किया जाएगा, इनको आदर्श नहीं बनाया जाएगा, इनकी पूजा नहीं की जाएगी, धनपतियों के लिए पागलखाने खोले जाएँगे। कि तुझे क्या बीमारी थी जो तू इतना इकठ्ठा कर के बैठ गया? क्या दुःख है तुझे? कौन सी असुरक्षा है? बच्चों को ये नहीं कहा जाएगा कि फलाने बड़े अरबपति हैं, उनको पूजो, उनको आदर्श बनाओ, वो प्रेरणाश्रोत  हैं, वो प्रेरणाश्रोत नहीं पागल है।

ज़रा सी भी आध्यात्मिक सूझ बूझ हो तो आदमी तुरंत समझ जाएगा, ज़रा सी भी हो। मैं गहरी समाधि की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं कह रहा हूँ होश की एक किरण भी हो तो भी समझ जाएगा कि इतना पैसा इकठ्ठा करना तो सिर्फ गहरी आंतरिक दरिद्रता का लक्षण है। जो भीतर से बहुत गरीब न हो, वो बाहर इतना पैसा नहीं इकठ्ठा कर सकता।

पर ये कैसी हमारी अजीब दुनिया है, जिसमें बच्चों को शिक्षा ये दी जा रही है कि अमीरों की ओर देखो, और वैसे बनो। और अमीरों को ये भुलावा दिया जा रहा है कि जब तुम दान करते हो, तो तुम दुनिया पर एहसान करते हो।



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