वैराग्य में भी अभ्यास ज़रूरी है?

वैराग्य क्या है?

वैराग्य ये है कि बादल, बादल तब तक प्रतीत हुआ जब तक मैंने बादल को बादल का नाम और संज्ञा दी। जिस क्षण मेरे मन ने ये भाव ही त्याग दिए कि बादल है, अब बादल होते हुए भी, नहीं है। ये वैराग्य है। पहला तरीका था “मैं बादल के विरुद्ध तब तक खड़ा रहूँगा जब तक बादल छँट ना जाएँ।” दूसरा तरीका है, “बादल है, ये कहा किसने? मैंने। बादल को बादल बनाया किसने? मैंने। तो मैं बादल के विरुद्ध लड़ूँ क्यों? बादल कृति किसकी है? मेरी, तो मैं ही चुप चाप कहे देता हूँ कि बादल, तू नहीं है।” और मैंने ये कहा नहीं कि बादल छँट गया।

अभ्यास उनके लिए है जिनका चित्त कर्मप्रधान है, वैराग्य उनके लिए है जिनका चित्त ज्ञान प्रधान है।और याद रखिये चित्त में दोनों ही गुण होते ही हैं। कर्मप्रधान यानी राजसिक गुण, ज्ञान प्रधान यानि सात्विक गुण। चित्त में दोनों ही मौजूद हैं, इसीलिए अभ्यास ओर वैराग्य को साथ साथ चलना होता है। अभ्यास ओर वैराग्य को इसीलिए साथ साथ चलना होता है।

वैराग्य क्या कहता है? “बादल, तू मेरे कहने के कारण था, मैंने तुझे बादल बनाया था, मैंने तुझे पकड़ रखा था कि तू बादल है। और जा मैंने छोड़ा, मैंने छोड़ा।” इस छोड़ देने का नाम वैराग्य है। मैं अब मानता ही नहीं कि तू बादल है, तू गया।

आकाश तो नहीं जन्म देता आकारों को, अविद्या जन्म देती है ना आकारों को। आकाश को क्या लेना देना? मैंने अविद्या को छोड़ा। पर भूलियेगा नहीं “बिना अभ्यास के वैराग्य काम न आएगा, और बिना वैराग्य के अभ्यास मात्र थकान देगा। अभ्यास एक प्रकार का गृहयुद्ध है, एक अंदरूनी लड़ाई, जिसमे आपका एक हिस्सा आपके विरुद्ध खडा है।” वैराग्य नहीं है तो अभ्यास बड़ा मुश्किल हो जाएगा, बड़ी हिंसात्मक हो जाएगी अन्दर की लड़ाई। ज्ञान भी चाहिए, अभ्यास भी चाहिए। क्योंकि गुण दोनों मौजूद हैं। सतोगुण भी, रजोगुण भी। फिर क्या है?

वैराग्य में भी अभ्यास ज़रूरी है?

 हाँ, अगर इतना आसान होता तुम्हारे लिए ये कह देना कि “बादल तुझे छोड़ा”, तो बादल तुम बनने  ही क्यों देते? बादल अविद्या से बना ना। इसका अर्थ क्या है? कि तुम्हारे भीतर वो वृत्ति गहरी बैठी हुई है जिससे बादल उठ रहे है। तुम कह सकते हो, “अंगारे, तुझे मैंने छोड़ा।” पर अगर तुम इतने ही होशियार हो कि अंगारे को अंगारा जान के छोड़ दो, तो तुमने अंगारा उठाया ही क्यों होता? वैरागी चित्त को बहुत बहुत सधा हुआ होना होता है। उसका बोध बड़ा गहरा होना चाहिए। बोध उतना गहरा था नहीं तभी तो तुम भ्रम में पड़े। तो इसीलिए उसके साथ अभ्यास ज़रूरी है।



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