तुम्हारी मर्ज़ी हो जाए बहुत बढ़िया, तुम्हारी मर्ज़ी न हो उससे भी बढ़िया।

तुम देखना जब तुम इस समस्त श्रृष्टि के साथ, एक अनुभव करोगे, तो तुम्हारी ज़रूरतें कैसे पूरी होने लगेंगी। तुम उसका कोई कारण नहीं खोज पाओगे, वो बात तर्क में समाएगी भी नहीं। तो तुम कह दोगे चमत्कार है, जादू है, हाँ जादू ही है, जादू ही तो है कि हम सांस ले पा रहे हैं, क्या जादू नहीं है? जादू ही तो है कि हम यहाँ बैठे हुए हैं। क्या जादू नहीं है? हाँ उसमे ओछे अहंकार को तृप्ति नहीं मिलती है, कि मैंने कमाया नहीं और मुझे मिल गया। पता नहीं कौन आकर के कैसे दे गया। हमें अच्छा लगता है कि अर्जित करें, पुरुषार्थ दिखाएँ।

पर अस्तित्व ऐसे नहीं चलता, जो तुम्हें वास्तव में चाहिए, वो तुमको धीरे से चुपके से आके कोई दे जाता है। तुम्हारी सारी ज़रूरतें तुमसे ज्यादा किसी और को पता हैं। वो दे जाएगा, धीरे से आकर के दे जाएगा, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा, दे जाएगा। और अगर कुछ ऐसा है जिसके लिए तुम्हें बहुत यत्न करना पड़ रहा है, तो साफ़ समझ लो कि शायद वो तुम्हें मिलना ही नहीं चाहिए।

यहाँ हम लोग बैठे हुए हैं, हम में से कई लोग किसी लक्ष्य कि तरफ बहुत कोशिश करते होंगे, कमर कस लेते होंगे, मेहनत करते होंगे, और पाते हैं कि उन्हें मिल नहीं रहा। बहुत कोशिश कर रहे हो तब भी मिल नहीं रहा। व्यर्थ ही ऊर्जा मत गँवाओ, व्यर्थ ही मन खराब न करो, शायद वो तुम्हेँ मिलना चाहिए ही नहीं। छोड़ दो, क्या ज़रुरत है? एक सीमा के बाद जो हो न रहा हो, उसके होने का प्रयास नहीं करना चाहिए। “अनहोनी होनी नहीं, होनी होए सो होए” उस सीमा को जानना ही विवेक है।

कोशिश करो, एक सीमा तक कोशिश करो, उसके बाद भी अगर कुछ नहीं हो रहा तो शायद अस्तित्व की यही मर्ज़ी है, मान लो, न दुखी हो, न और छटपटाओ कोशिश कर करके। उसके आगे सिर्फ तड़प मिलनी है तुम्हें। तुम असम्भाव्य को परिनीत कर देना चाहते हो, वो हो सकता नहीं। तुम उलटी गंगा बहाना चाहते हो, वो बहेगी नहीं। उन मौकों पर थोड़ा सा बुरा लगेगा, मैं जो चाहता था, वो हुआ नहीं। पर जब बुरा लगे, तो अपने मन से बात करना, उससे कहना “तुझसे ज्यादा बड़ी मर्ज़ी किसी और की है और वो तेरा बड़ा हितैषी है, अच्छा हुआ, जो चाहता था तू वो हुआ नहीं”, “भला हुआ मेरी गगरी फूटी, अब मैं पनिया भरण से छूटी”।

तुम्हारी मर्ज़ी हो जाएबहुत बढ़ियातुम्हारी मर्ज़ी न होउससे भी बढ़िया



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