हमने शरीर को हेय दर्जा दे रखा है

भारत का शरीर बीमारियों का घर बन गया है। कुपोषण के सबसे ज्यादा मामले भारत में हैं। और ये मत सोचियेगा कि कुपोषण का एकमात्र कारण गरीबी है। दो साल से कम उम्र के बच्चों में जो कुपोषण पाया जाता है, वो मात्र इसीलिए नहीं पाया जाता की उनके माँ बाप उन्हें खिला पिला नहीं पाते, इसीलिए भी पाया जाता है क्योंकि उनके माँ बाप खिलाने पिलाने की तरफ ध्यान ही नहीं देते। ठीक ठाक आर्थिक स्थिति वाले घरों में भी बच्चें कुपोषित हैं। पैसा है माँ बाप के पास, चाहें तो खिला सकते हैं, बच्चे तब भी कुपोषित हैं। चार चार, पांच पांच साल के बच्चों कि आँखों पर चश्मा लगा हुआ है, ऐसे थोड़ी है कि उनके घर पर खाने को नहीं है।

ऐसा इसीलिए है क्योंकि हमने शरीर को हेय दर्जा दे रखा है। जो माँ कभी अपने शरीर का खयाल नहीं रख पाएगी, जिसको पता ही नहीं है कि शरीर माने क्या? वो बच्चे के पैदा होते ही अचानक ज्ञान विभोर तो नहीं  हो जायेगी? कहाँ से जान जाएगी वो कि शरीर माने क्या? अभी कुछ माह पहले जब यूरोप में था, वहाँ देख रहा था कि ठण्ड है खूब, उसके बाद भी लोग करीब करीब पूर्णतया निर्वस्त्र होके और कई बार तो पूर्णतया ही निर्वस्त्र होके बीच पर पड़े हुए हैं। धूप खिल आए तब तो ज़रूर ही, कई बार धूप नहीं है तब भी। ये वहाँ बात ही बड़ी विचित्र मानी जाए कि कोई बीच पर है, और पूरे कपड़े पहन  कर के घूम रहा है। उन्हें अपने शरीर का तिरस्कार नहीं करना है। उन्हें अपने शरीर को लेके कोई मिथ्या नहीं है, इसीलिए उनके शरीर फिर सुन्दर भी हैं।

हम तो बीच पर भी कुरता पायजामा पहन कर चलेंगे। तो ज़ाहिर सी बात है कि मोटी तोंद, थुल थुल जांघें, भरे पूरे नितम्ब छुपे हुए रह जाते हैं। अरे ज़रा मर्द की तरह दौड़ लगाइए रेत पर, घुस जाइए पानी में, एक कच्छा पहन रखा है आपने, काफी है। वहाँ पहन लेती हैं टू पीस, और बिकिनी, तो फिर उन्हें ख्याल भी रखना होता है कि शरीर भी ऐसा रहे कि उसपर बिकिनी पहनी जा सके। यहाँ तो पहननी ही नहीं है तो पचास किलो से पहले सत्तर किलो, फिर नब्बे किलो, अब पति बिचारे की हिम्मत कहाँ है कि कुछ बोल दे कि भैंस हुई जाती है।

आप शरीर पर ध्यान मत दीजिये, आप शरीर को बर्बाद होने दीजिये, शरीर आपको बर्बाद करेगा, हर तरीके से। आप मन पर ध्यान मत दीजिये, आप मन की सहज तरंगों का दमन करिए, मन आपका दमन कर देगा। मन तो जानना चाहता है, मन जिज्ञासु है, मन पूछता है, आप कहिये ना ज्ञान तो व्यर्थ है, सत्य तो जाना जा ही नहीं सकता, तो ज्ञान का फायदा क्या? तो नतीजा वही निकलेगा कि आपको छोटी से छोटी तकनीक के लिए पश्चिम की ओर देखना पड़ता है। ठीक है, थोड़ी तरक्की कर ली है, लेकिन फिर भी। क्योंकि आपने तो कह दिया, ज्ञान में रखा क्या है? उत्सुकता, कौतूहल, ये तो व्यर्थ की बातें हैं। परमात्मा तो अचिन्त्य है। उसके बारे में तुम क्या कौतुहल करते हो? कोई सवाल पूछना ही व्यर्थ है। सवाल क्या पूछें?



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