क्षण क्षण आपकी मृत्यु हो रही है और क्षण क्षण आप पुनर्जीवित हो रहे हैं।

होता क्या है कि हम कृष्ण के वक्तव्य को किसी व्यक्ति का वक्तव्य समझ लेते हैं जो किसी दूसरे व्यक्ति अर्जुन के प्रति दिया गया है, उनकी बात को सुनिए जब वो कह रहे हैं कि हजारों जन्म लगते हैं और लाखों योनियाँ लगती हैं ओर किसी विरल क्षण में ही सत्य सुलभ हो पाता है। तो उस बात को किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि मन को संबोधित जानियेगा, कि मन हज़ारों चेहरे बदलता है, हज़ारों रंग बदलता है, तब जाकरके एक रंग उसे सत्य का मिलता है। अब मन को कितनी देर लगती है बदलने में? मन का बदलना ही एक पूरा जीवन है। मन बदला नहीं कि एक जन्म पूरा हो गया।

तो यदि आपसे कहा जा रहा है कि हज़ारों जन्मों बाद आपको सत्य के दर्शन होंगे, तो बड़ी दूर की बात नहीं की जा रही है, क्योंकि हज़ारों जन्म तो आपके दो मिनट में हो जाते हैं। मन के रंग का बदलना माने पुनर्जन्म। आप क्या अभी वही हैं जो आप पाँच मिनट पहले थे? पर चूंकि शरीर वैसा ही होने का एहसास कराता है तो हमको ऐसा लगता है मानो हम वही हैं, सत्य तो ये है कि पिछले कुछ मिनटों में ही आप कई मौतें मर चुके हैं ओर कई जन्म जी चुके हैं।  “मन के बहुत रंग हैं, छिन छिन बदले सोय” क्षण क्षण आपकी मृत्यु हो रही है और क्षण क्षण आप पुनर्जीवित हो रहे हैं।

तो बहुत समय नहीं लगता है अर्जुन को कृष्ण के सामने आ जाने में क्योंकि तुरंत बीतते हैं हज़ारों क्षण। ये जो चौरासी लाख योनियाँ हैं, किसी दूसरी योनी में जन्म लेने हेतु आपको सौ साल थोड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, आप किसी के रक्त के प्यासे हो गए, तो आप सिंह हैं। आप डर गए, आप शशक हैं, आपके भीतर कुटिलता आ गयी, आप लोमड़ी हैं। हो तो रहे हैं आपके पुनर्जन्म, लगातार लगातार हो रहे हैं। आप उद्यम कर रहे हैं, आप संचय कर रहे हैं, आप चीटी हैं। पर चूंकि शरीर एक सा ही दिखाई देता है तो आप मानते ही नहीं कि मर भी गए, चींटी के रूप में जन्म भी ले लिया, अब चीटी गई, अब खरगोश बन गए।

अब खरगोश गया, आप दुत्कारे जा रहे हैं, घर पहुँच गए हैं, आप कुत्ते हैं। अब मिल गया कोई असहाय जो सामना नहीं कर सकता तो चढ़े जा रहे हैं उसके ऊपर, आप शेर हैं।  तो यही तो सब पुनर्जन्म है, पुनर्जन्म ये थोडा ही है कि आप मरोगे, फिर कोई सरसराती हुई धुएँ समान आत्मा निकलेगी, वो कहीं जाके किसी गर्भ में प्रविष्ट हो जाएगी, फिर उसमे से आप चूहा बन के निकलोगे।  जो इधर उधर भाग रहा हो, बिलों में मुह डालता हो, वो चूहा। चूहा माने कौन? जो घुस जाए, कहीं बिल बना ले ओर फिर निकल के देखे बाहर और जाए बाहर, वहाँ बिस्कुट का छोटा टुकड़ा पड़ा है, उठा के लेके आए, वो चूहा। और कौन होता है चूहा? दम्पलाट खाए जा रहे हैं, जितनी आवश्यकता नहीं है, मंद-मंद चल रहे हैं, हौले हौले सूंड़ हिल रही है सो हाथी। अभी हाथी हो तो बोझ भी ढोओगे, सबसे ज्यादा तुम्हारे ही पीठ पड़ेगा, पड़ भी रहा है।



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