राम, कृष्ण वही हैं जिन्हें अपना पता है

राम, कृष्ण वही हैं जिन्हें अपना पता है, वो नहीं देखने जाते कि किसी और की बात सुनें या देखें उसने क्या किया, उससे जोड़ें। स्वयं से बचने का उपाय है कि किसी को आदर्श बना लो। राम किसी से पूछ के गए थे सीता को ढूँढने? पूछा था पिताजी से? यदि जीवित हों तो बताएँ? वो हैं ही नहीं। राम-कृष्ण बाहर नहीं हैं, अन्दर हैं तुम्हारे। जब तुम इधर-उधर की झंझटों को कीमत देना छोड़ देती हो, तब तुम्हारे भीतर से जो बोले वही राम है, वही कृष्ण है। तो उन्हें आदर्श बनाने की कोई ज़रुरत नहीं है।

आदर्श तो सब बाहर होते हैं और आदर्शों को तो तुम अपने अनुसार नचा सकती हो, चुन सकती हो। जब मन करे दूसरों की सुनने का, दूसरों से प्रभावित हो जाने का, तो कह दो राम भी तो धोबी से न हुए थे प्रभावित। धोबी की सुनी होती है। धोबी माने समाज, समाज जब कहे कि गड़बड़ है तो बीवी को घर से निकाल दो। लो, बन गये राम आदर्श। जब एक साथ पाँच छह लड़कियाँ छेड़नी हो तो कृष्ण बन जाओ। बन गए कृष्ण आदर्श। तो आदर्शों को तो तुम अपने अनुसार नचा लोगी। मज़ेदार बात तो तब है जब कृष्ण और राम तुम्हारे भीतर बैठ कर तुम्हें नचाएँ। तुम उनकी ताल पर नाचो, उन्हें अपने अनुसार नचाने की चेष्टा मत करो।


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