मुक्त गति करो, मुक्ति; मुक्त थमे रहो, मुक्ति

हाथों पर बेड़ियाँ पड़ी हों तो बात बहुत छोटी होती है, वो बेड़ियाँ स्थूल होती हैं, दिखाई देती हैं, आप उन्हें काट दोगे, आँखों के सामने हैं। आँखों के पीछे जो बेड़ियाँ होती हैं वो ज्यादा खतरनाक होती हैं, उनको धारणाएँ कहते हैं। इसी धारणा से मुक्त होना है। यायावर घूमने में, घुमक्कड़ी में न अच्छा है, न बुरा है। न वो हो जाने को आदर्श बना लेना है, न उससे दूर जाने को आदर्श बना लेना है। कभी वो जीवन में आती है, स्वागत है उसका। जब जो जीवन में आता है वो कभी विदा भी हो जाता है, एक दिन होगा जब आपके पाँव घूमने के लिए उद्दत होंगे, एक दिन होगा जब आपके चलते पाँव कहीं ठहर जाएँगे। क्या अच्छा है इसमें, क्या बुरा है?

मुक्त हो कर के घूम लिए तो मुक्ति और मुक्त हो कर के ठहर लिए तो भी मुक्ति। न घूमते रहना बड़ी बात है, न ठहर जाना बड़ी बात है। न गति में कुछ है, न अगति में कुछ है। न स्थिरता में कुछ है, न चलायमान होने में। मुक्त गति करो, मुक्ति; मुक्त थमे रहो, मुक्ति।

पर हम ऐसे अमुक्त हैं कि मुक्ति को भी धारणाओं के पीछे से ही देखते हैं, “अगर मुक्ति ने मुझे घुमक्कड़ बना दिया तो मुक्ति बुरी है।” क्यों? क्योंकि बचपन से ही मुझे बताया गया है कि जो घूमते फिरते रहते हैं वो कहीं के नहीं हो पाते, कोई घोंसला नहीं बनता, कोई ठिकाना नहीं बनता, समाज में कोई स्थान नहीं बनता ओर वो प्रगति नहीं करते। जो ज़रा एक जगह पाँव जमा देते हैं, थम जाते हैं, स्थापित हो जाते हैं, वो बढ़ते हैं जीवन में ओर समाज में आगे। तो मुक्ति हो सकता है मुझे घुमक्कड़ बना दे, ओर ये मैंने पहले ही मान रखा है कि घुमक्कड़ होना बुरा है।



पूर्ण लेख पढ़ें: मुक्ति और लापरवाही