तुम्हारी ज़िन्दगी में ऐसा है क्या जो दुनिया से निराला हो?

शर्त बस उसी ईमानदारी की है, चाहे भीतर देखो, चाहे बाहर| भीतर देखने के लिए जितनी ईमानदारी चाहिए, उतनी ही ईमानदारी बाहर देखने के लिए भी चाहिए| तो कोई दिक्कत नहीं तुम दुनिया को देखो, अपने भाईयों को देखो, समाज को देखो पर जब देखो तो जरा पैनी नज़र से, तीव्र बुद्धि से, और शांत ध्यान से देखो| हम सब अलग अलग थोड़ी है|

दुनिया का मन बहुत कुछ एक सा है| हमारे मस्तिष्क एक साथ विकसित हुए हैं और उनके मूलभूत संस्कार एक ही हैं| जो बाहर हो रहा है वही भीतर हो रहा है, जो जगत की कहानी है वही तुम्हारे घर की कहानी है|

तुम्हारी ज़िन्दगी में ऐसा है क्या जो दुनिया से निराला हो| वही सारे आदिम खेल, वही सारी गहरी वृतियाँ, वही जन्मना-मरना, वही आकर्षण-विकर्षण, वही पसंद-नापसंद, वही उत्तेजनाएँ और उदासियाँ| थोड़े बहुत नाम अदल-बदल हो सकते है, पर कुछ नया है क्या तुम्हारे पास? अब ये बात भी लेकिन मेरे बताने की नहीं है| मेरे पास कुछ नया नहीं है बताने को, ये जानना कोई असाधारण उपलब्धि नहीं है| रहते तो हम सब इसी गलत फहमी  में है कि मैं कुछ अनूठा ही हूँ|

“मैं बिलकुल बासी, पुराना और सौ बार प्रयुक्त हूँ” ये खोज भी दुनिया को देख कर ही होती है वरना तो हम इसी ठसक में जीये जाते हैं कि हम कुछ विशेष हैं, हमारे साथ जो हो रहा है वो दुनिया में पहली बार घट रहा है|

दुनिया को देखो तो पता चलता है कि तुम तो बिलकुल ही घिसी हुई सी.डी  हो  जो करोड़ों साल से बज रही है तुमसे बीस पीढ़ी पहले वालों ने क्या किया उससे अलग तुम कुछ नहीं कर रहे हो और तुमसे बीस पीढ़ी पहले वालो ने अपने से दो सौ पीढ़ी पहले वालों से भिन्न कुछ नहीं किया| देखो दुनिया को ध्यान से, तुम्हें अपना ही प्रतिबिम्ब दिखायी देगा| रहते तो हम इस इसी गलत फहमी में है ना कि मैं कुछ अनूठा हूँ| तुम्हारे मन में आकर्षण उठता है, तुम्हें लगता है प्रेम है, और तुम बौरा जाते हो कि कुछ खास हो गया|



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