भूत और भविष्य दोनों ही काल्पनिक हैं

तुम देखो, कि तुम भविष्य के बारे में क्यों सोचते हो फिर समझ जाओगे कि  सोचें? कि न सोचें? कि क्या करें? कि क्या न करें?  मुझसे जल्दी से निर्णय मत मांगो, पहली चीज़ मैंने यही कही थी कि निर्णय मैं नहीं दूँगा।

तुम देखो पहले कि जो तुम्हारा मन है, वो भविष्य या भूत में क्यों घूमता रहता है? वो इसलिए घूमता रहता है, क्योंकि वर्तमान में वो होना नहीं चाहता। इसलिए वो या तो याद्दाश्त में जाता है, या अपेक्षा में जाता है। या तो याद्दाश्त में जाएगा जो भूत में है, या अपेक्षा में जाएगा जो भविष्य में है। और भूत और भविष्य दोनों ही कल्पनाएँ हैं। दोनों ही सिर्फ छवियाँ हैं। दोनों में, कोई हक़ीक़त नहीं। मर गए, ख़त्म हो गए। एक ख़त्म हो चुका है, और एक अभी आया ही नहीं।

जो है सो अभी है। यहाँ तक कि उनके बारे में सोच भी तुम अभी ही रहे हो। वो कल्पनाएँ भी अभी ही हो रही हैं। उनका अस्तित्व नहीं है। भूत और भविष्य दोनों ही काल्पनिक हैं। लेकिन फिर भी हम वहीँ जाना चाहते हैं।

अब तीसरे वर्ष  (इंजीनियरिंग) में आ गए हो, ये हो गया है। मिलते हैं विद्यार्थी कई बार, “सर, अब तो क्या है, कक्षाओं में क्या है, अब तो हम परलोक की तैयारी कर रहे हैं।

(छात्र हँसते हैं)

हाँ, ये कैंपस की चारदीवारें हैं, अब इनसे बाहर निकलेंगे, दूसरे लोक में पहुँचेंगे। तो अब परलोक की तैयारी चल रही है। अच्छी बात है।

तुम इस दुनिया में होते ही कब हो? पहले वर्ष   में घुसते हो, तो चौथे  वर्ष  की प्रतीक्षा कर रहे होते हो। वहाँ भविष्य बैठा हुआ है। कक्षा बारहवीं में होते हो तो सोच रहे होते हो दाखिला कहाँ मिलेगा और आगे भविष्य बैठा हुआ है। तुम जहाँ पर भी हो, उससे एन + वन, एन + टू, एन + थ्री  पर तुम्हारा चित्त है।



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