कर्म छू नहीं सकता शब्द से भी पाएगा कौन, राम तक पहुँचेगा मन होकर मात्र मौन

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हाथ सुमरनी पेट कतरनी, पढ़त भागवत गीता ।

राम भजा सो जीता जग में, राम भजा सो जीता ।।

संत कबीर

वक्ता: पढ़ने में और भजने में क्या अंतर है?

श्रोता१: भजा तभी जा सकता है जब उस चीज़ को समझ सको।

श्रोता२: भजा मतलब एक पूरी  मौजूदगी  इन्वॉलव्ड  है।

वक्ता: वो क्या होती है?

श्रोता२: मलतब कि ह्रदय इन्वॉलव्ड  होना चाहिए।

वक्ता: कैसे पता आपको कि ह्रदय इन्वॉलव्ड है, कि मन इन्वॉलव्ड  है और मौजूदगी इन्वॉलव्ड है?

श्रोता२: आचार्य जी, ‘मौजूदगी’ बता देती है ना।

वक्ता: नहीं, कैसे? क्या बता देता है? अब इतना पता चल रहा होता, बता ही दे रहा होता तो ज़िन्दगी दूसरे तरह की हो जाती न, सबसे ज़्यादा तो ज़िन्दगी बता देती है। ये मौजूदगी क्या चीज़ होती है? अहंकार का ख़त्म होना क्या है? ये बौद्धिक रूप से समझना क्या हुआ? पढ़ना एक तरह का अनुवाद है, ट्रांसलेशन । ठीक वही जो हुआ अभी, कि पूछा गया, “बढ़ना क्या है अहंकार का?” बढ़ जाए तो बढ़ना है, अहंकार घट जाए घट तो घटना है, और अहंकार क्या है? “वो जो कभी बढ़ जाए, कभी घट जाए।”

मूर्खता करने का लक्षण यह है कि आप एक धारणा को दूसरे धारणा के संबंध में व्याख्या करते है और फिर आप दावा करते हैं कि आप समझ चुके हैं। यह मूर्खता करने का सुरक्षित अनुमान है| जिस पल आपसे पूछा जाता है, आप उसे एक धारणा की तरह लेते हैं, और आप क्या करते हैं? आप इसका विवरण दूसरे धारणा के सम्बन्ध में देते हैं, आप इसे दूसरी धारणा में अनुवाद करते हैं और फिर आप कहते हैं, ” मैं इसको समझ गया हूँ|”

तो, पानी क्या है? वाटर । वाटर क्या है? आब। आब क्या है? जल। नहीं, अभी तुम समझ नहीं रहे हो, गहरे जाओ, ठीक है पानी ऐच2ओ है, अब? और दावा होगा कि हम समझ गए, ये पढ़ना है।

पढ़ने का मतलब है अनुवाद। जो पहले ही मन में मौजूद था, उसको उसी भाषा में ला दिया। जहाँ अनुवाद होता है वहाँ कुछ सार पहुँच सके उसकी कोई सम्भावना ही नहीं है इसीलिए अनुवाद मशीनें खूब कर लेती हैं, कोई भी मशीन अनुवाद कर लेगी। पढ़ने का अर्थ यही है कि पढ़े जा रहे हैं, उसका अनुवाद करे जा रहे हैं। आपकी जो गाँठ है वो बैठी हुई है, उसके अगल-बगल से सब आ रहा है, जा रहा है और आपका दावा ये है कि पढ़ाई हो रही है।

पढ़ना ऐसा ही है कि जैसे सामने कोई लक्ष्य हो, आप उस पर तीर चला रहे हो और जितने आप तीर मार रहे हैं उसके अगल-बगल से निकले जा रहे हैं और आप बहुत खुश हैं कि मैंने सारे तीर चला लिए। जिसको लगना था वो अपनी जगह कायम है, उसको कुछ नहीं हो रहा, वो हिला ही नहीं है। पढ़ना, समझ लीजिए करीब-करीब ऐसा ही है कि जैसे आपका घाव बिलकुल वैसा ही है सड़ा हुआ, बज-बजाता हुआ, बदबू देता हुआ और आपने उसके ऊपर की पट्टी का रंग बदल दिया है। और आप सोच रहे हैं कि ‘मौजूदगी’ बदल गई।

पट्टियों के रंग बदलते जा रहे हैं, कभी आप हरी पट्टी लगाते हैं, कभी आप लाल पट्टी लगाते हैं, कभी आप पिली पट्टी लगाते हैं। अंदर घाव वैसे का वैसा है| पेन बोलो, चाहें पीड़ा बोलो, घाव तो वैसे का वैसा ही है, अनुवाद कर दिया आपने उसका; क्या मिल गया आपको इससे? जो होना था वो नहीं हो रहा है, उसके अलावा समय खूब ज़ाया हो रहा है, ये है पढ़ना। कोई आंतरिक क्रिया चल रही है, वो क्रिया जिस उदेश्य के लिए थी वो उदेश्य कहीं से पूरा नहीं हो रहा है, बस समय नष्ट हो रहा है और ये भ्रम बरकरार रखने में मदद मिल रही है कि “हाँ, कुछ सार्थक काम हो रहा है।” कोई सार्थक काम हो ही नहीं रहा है।

भजने का शब्दों से कोई लेना देना ही नहीं है। भजने का अर्थ है, जिसको याद कर रहे हो मन लगातार उसी के साथ स्थापित है। शब्द तो सिर्फ उपकरण था उसकी याद करने का। वो उपकरण मौजूद है तो भी मन वहीं स्थापित है जहाँ उसे होना था, वो उपकरण मौजूद नहीं है तो भी मन उसी केंद्र पर बैठा हुआ है।

जैसे इस कमरे में हम सब बात-चीत कर रहे हों और जो हमें बात-चीत करनी है वो चलती रहे, एयर कंडीशनर  की आवाज़ भी आ रही है, और इन सारी आवाज़ों के पीछे पार्श्व में महीन संगीत बजता रहे, कि और जो चलना है वो चलता रहे पर पीछे का वो संगीत हमेशा कायम रहता है। कमरे में जो आवाजें हैं वो बदल सकती हैं, कभी आवाज़ हो सकती है कभी नहीं हो सकती है। कमरे में जो आवाज़ है वो कभी बड़ी प्रीति की हो सकती है, कभी उतेजना की भी हो सकती है, कभी हाँ कह सकती हैं, कभी न कह सकती हैं, हज़ार तरह की आवाज़ हो सकती हैं कमरे में, पर आवाज़ कैसी भी हो और आवाज़ कैसी भी बदल रही हों, पीछे का जो सूक्ष्म संगीत है वो लगातार कायम है इसका नाम है भजना।

भजना अपने आप में कोई कृत्य है ही नहीं| पढ़ना कृत्य है, पढ़ना निश्चित रूप से कृत्य है। भजना कृत्यों के पीछे का अकृत्य है। बाहर-बाहर तमाम कर्म चलते रहते हैं, बाहर-बाहर कर्ता मौजूद रहता है और उनके पीछे जो अकर्ता बैठा हुआ है उसके मौन का नाम है भजना। उनके पीछे जो अकर्ता बैठा हुआ है उसके सूक्ष्म संगीत का नाम है भजना। तो भजने को हम कोई गतिविधि न समझें, न बना लें। पढ़ना गतिविधि है, पढ़ना जैसा हमने कहा “उपकरण मात्र है मन को भजने की दिशा में ले जाने के लिए।” पढ़ने से यदि भजना संभव हुआ तो पढ़ना सार्थक। और यदि पढ़ना दिन की एक और गतिविधि ही बन के रह गया तो वो पढ़ना व्यर्थ ही गया।

तीन तरह के लोग हुए, तीन तरह के मन हुए : एक वो, वो पढ़ते भी हैं तो भी पढ़ने के दरमियान भी भज नहीं पाते। आँखें पढ़ रही हैं, आँखें शब्दों को, दृश्यों को, चित्रों को देख रही हैं, मन उनका अनुवाद कर रहा है और बस इतना ही हो रहा है। ९५% लोग, ९५% समय ऐसे ही पढ़ते हैं, आँखों से और मन से। आँखों ने शब्द को देखा, शब्द एक चित्र है, आँखों ने शब्द को देखा, मन ने उसका अपनी परिचित भाषा में अनुवाद कर दिया और बात खत्म हो गयी। बुद्धि ने आकर निर्णय सुना दिया कि तुम समझ गए। मन संतुष्ट होकर के आगे बढ़ गया, अगले शब्द पर पहुँच गया, ये हमारा आम पढ़ना है।

बाँकी लोग, बाँकी समय, बाँकी मन ऐसा पढ़ते हैं और याद रखिएगा मैं शेष पाँच प्रतिशत की बात कर रहा हूँ १/२०, ये २० में से जो एक व्यक्ति है वो ऐसे पढ़ता है कि जब पढ़ रहा है उस समय, कम से कम उस समय डूब गया है पढ़ने में। अब आँखें शब्दों को देख रही हैं, मन उनका अनुवाद कर रहा है पर प्रक्रिया बस इतनी सी ही नहीं है, कुछ और भी है जो होने लग गया है। और मज़ेदार बात ये है कि अब जो कुछ होने लग गया है वो बाकि सब होने का अवसान है। अब पार्श्व में जो घटना घटने लग गई है वो बाकि सारी घटनाओं का रुक जाना है।

आँखें देख रही हैं, मन स्मृति से उसको जोड़ रहा है, शब्दों के अर्थ पकड़ रहा है, अनुवाद कर रहा है, बुद्धि विशलेषण भी कर रही है और कुछ और भी है जो होने लग गया है। जिसका सम्बन्ध न पढ़े जा रहे शब्द से है, न अतीत की स्मृति से है, न भाषा से है, न विशलेषण से है। एक धुन बजने लग गयी है, बड़ी महीन, बाँकी सब जो हो रहा था वो रुक सा गया है। मन का इधर-उधर का भटकना रुक गया है, माहौल पर जाता ध्यान रुक गया है, संसार रुक गया है, यहाँ तक कि समय रुक गया है। आँखें पढ़ रही हैं, मन, बुद्धि उसको जोड़ रहे हैं और विशलेषित कर रहे हैं और बाकि सब ठहर गया है, स्थिर, कुछ बचा नहीं। इस कुछ न बचने में वो मौन संगीत आविर्भूत होता है।

सुन्दर स्थिति होती है ये, बड़ी सुकून की स्थिति होती है ये लेकिन दुर्भाग्य ये है कि इन बचे हुए पाँच प्रतिशत लोगों के साथ भी वो स्थिति मात्र तभी तक चलती है जब तक वो शब्द उनके समक्ष मौजूद हैं। शब्द हटते हैं और वो पाते हैं कि थोड़ी ही देर में वो स्थिति भी विलुप्त हो गयी। स्वाद तो मिला पर पेट नहीं भर पाया, दो चार साँसे तो ली पर उनसे जीवन नहीं चल पाया।

फिर एक तीसरा मन भी होता है, वो इतना दुर्लभ होता है कि उसको सौ प्रतिशत की गिनती में भी नहीं रखा जा सकता। वो मन है ही नहीं, वो गिनती से बाहर है। वो वहाँ पहुँच जाता है जहाँ से लौटने की अब कोई समभावना नहीं है। वो राम धुन में अब ऐसा खोया है कि और कोई शब्द पढ़े न पढ़े, और कोई ध्वनि सुने न सुने ये धुन बजती रहेगी, ये धुन रुकेगी नहीं। किताब सदा नहीं खुली रह सकती, किताब बंद हो जाएगी; हर किताब को कभी न कभी बंद होना पड़ता है। बाहर का कोई भी माहौल सदा नहीं बना रह सकता, माहौल बदल जाएगा। माहौल का अर्थ ही है वो जो बदले।  पर भीतर उसने किसी ऐसी जगह को पा लिया है जहाँ से अब उसका हटने का मन ही नहीं करता। किसी ऐसे विश्राम को उपलब्ध हो गया है जहाँ से उठकर के दुबारा थकने की उसकी अब तबियत ही नहीं होती। एक ऐसे मौन में स्थापित हो गया है, जहाँ अब संभावना ही नहीं है किसी भी प्रकार के शोर-शराबे की। तो शोर-शराबा बाहर चलता रहेगा, हज़ार तरह की ऊँच नीच होती रहेगी, मौसम बदलते रहेंगे, सोना जगना चलता रहेगा, भजना नहीं रुकेगा।

उसने रोटी खाई की नहीं खाई इसका उत्तर हो सकता है, दोनों संभावनाएँ हैं। वो सो रहा है या जग रहा है यहाँ भी दोनो संभावनाएँ हैं, वो सुखी है या दुखी है यहाँ भी दोनों संभावनाएँ हैं, उठा हुआ है बैठा हुआ है, चल रहा है कि दौड़ रहा है, शरीर से बीमार है कि स्वस्थ है, सब में दोनों संभावनाएँ हैं, पर वो भज रहा है या नहीं इसमें अब दो संभावनाएँ नहीं है। वो तो हो ही रहा है, उसकी न पूछो, उसकी तो पूछना ही अब व्यर्थ हो गया, उसका कोई उत्तर ही नहीं है अब, उसमे कोई दूसरी संभावना ही नहीं है अब। वो गूंज तो बनी ही हुई है, वही असली है, वही नित्य है, वही सदा मौजूद है, वही उसका ठिकाना है, वही सखा सहारा है। कुछ होता रहे बाहर बाहर, वो उसका घर है। और वो एक ऐसा घर है जहाँ कुछ बदलता नहीं, जहाँ वो राम धुन लगातार बजती ही रहती है। तो इसलिए वो घर बहुत सुरक्षित है। वहाँ कोई बदलाव नहीं होता, कोई बदलाव वहाँ होता ही नहीं।

आम आदमी जिस सुरक्षा की तलाश निरंतर बाहर-बाहर जीवन भर करता रहता है कि कुछ तो ऐसा मिल जाए जो समय के साथ बदले नहीं। ये मन, ये अद्भुत मन, ये विलक्ष्ण मन उस सुरक्षा को अपने भीतर ही पा लेता है, संसार अब इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। संसार इसे अब कुछ दे भी नहीं सकता, इस कारण संसार से भी इसका रिश्ता अब बड़ा क्रीड़ात्मक हो जाता है। जहाँ लेना देना नहीं है बस होना है और खेलना है।

पढ़ना किसी काम न आया अगर भज न पाए। इसीलिए कबीर कह रहे हैं कि भागवत पढ़ो या गीता पढ़ो कोई काम न आएगी तुम्हारे, क्योंकि पढना संभव है, पढ़ना बाहरी है, पढ़ना वैसे ही है जैसे हाथ में सुमरनी और भीतर, पेट में, मन में तमाम तरह की हिंसा चल रही है। हाथ सुमरनी पेट कतरनी, कतरनी माने काटना, बाँटना, हिंसा, टुकड़े करना, कैंची। पढ़ना उतना ही बाहरी है जितना हाथ में धारण की हुई माला, बाहर-बाहर।  हाथ सुमरनी पेट कतरनी, पढ़त भगवत गीता। भागवत पुराण पढ़ लो, चाहें भगवत गीता पढ़ लो, बाहर ही रह गया अगर उनका पढ़ना तुम्हें भजने में स्थापित नहीं कर पाया।

आगे कहते हैं कबीर, राम भजा सो जीता जग में, राम भजा सो जीता। पढ़ के नहीं जीते, भज के जीते। पढ़ने  वालो ने कभी कुछ नहीं जीता, भजने वालो ने सब जीता। और मज़ेदार बात है कि कबीर ये नहीं कह रहे हैं कि ‘राम भजा सो त्यागा जग को’| कबीर ये भी नहीं कह रहे हैं कि ‘राम को जिसने भजा उसने किसी और जग को जीता कोई और परलोक’| न, कबीर कह रहे हैं राम भजा सो जीता, इस जग में जीता।

जिसके वो शून्य नाद अनव्रत बजता रहता है उसकी कोई विशेष रुचि नहीं रहती जीतने में। जो उस मौन में, उस सुरक्षा में, उस घर में स्थापित रहता है उसकी अब जीतने में कोई रूचि नहीं रह जाती। और यही इस बात का प्रमाण है कि वो जीत गया। आप अपने को जीता उस दिन मानिएगा जिस दिन आपकी जीतने में रुचि खत्म हो जाए।

अभी दो चार रोज़ पहले की बात है, यहीं हम सब साथ के लोग मैदान में क्रिकेट खेल रहे थे। तो हमारी टीम की बैटिंग करा दी दूसरे पक्ष ने और जब अपनी बल्लेबाजी लेने का नंबर आया तो उन्होंने कहा, “हमें खेलना ही नहीं है।” मैंने चेहरे से दर्शाया नहीं कि मुझे इस पर कैसा लगा पर ये बहुत शुभ संकेत है। जीतना तो छोड़ो आपकी अब वसूलने में ही रूचि नहीं रही, बहुत बढ़िया।

खेल के मैदान में, खासकर के क्रिकेट में ऐसा होता नहीं है कि आप गेंदबाजी कर दो, दूसरी टीम को खेला दो बैटिंग करा दो और अपनी बैटिंग लेने का जब समय आए तो आप कहो कि “हम ऐसे ही ठीक हैं। हमें नहीं करनी बैटिंग। हम थक गए हैं।” आप जीत गए, वो मैच वो जीत गए। बैटिंग किए बिना जीत गए। दोहरा रहा हूँ, जिस दिन आपकी जीतने में रूचि खत्म हो जाए उस दिन आप जीत गए और जिस दिन तक अभी आपकी लड़ने में और जीतने में रूचि है उस दिन तक आप हारे ही हारे हुए हो। दो पक्ष लड़ रहे हैं और दोनों उत्सुक हैं कि हमें जीतना है, दोनों में से कोई नहीं जीतेगा। बाहर बाहर से चाहें लड़ाई का अंजाम जो हो असली बात ये है कि दोनों ही पक्ष हारे, कोई नहीं जीता।

राम भजा सो जीता जग में। जिसके वो नाद बजने लगता है, अहर्निश वो भूल ही जाता है कि बाहर जीते कि हारे। ये उसकी परम जीत है। ये उसकी परम जीत का प्रमाण है क्योंकि कोई अरबपति ही इस बात की परवाह नहीं करेगा की सौ, दो सौ, दो हज़ार जीते की नहीं जीते। जिस दिन आपकी दो-चार सौ, दो-चार हज़ार, दो-चार लाख, दो-चार करोड़ जीतने में रूचि ख़त्म हो जाए उस दिन आप समझ लीजिएगा की आपने किसी अपूत सम्पदा को पा लिया है। नहीं तो आप इतना पैसा छोड़ कैसे देते? जो परम धनी होगा वही धन को छोड़ सकता है। “अरे भाई इतना है मेरे पास कि थोड़ा बहुत छोड़ भी दिया तो क्या हो गया?”

जो परम विजेता होगा वो इन छोटी मोटी लड़ाईयों में पड़ेगा ही नहीं, वो कहेगा, “हार गए हम। हमें हारने में कोई संकोच ही नहीं है। तुम जीते हम हारे। हम जिस शिखर पर बैठे हैं वहाँ बैठ कर के उलझा नहीं जाता। छोटी मोटी उलझनों को तो विदा कर दिया जाता है। कि बोलो क्या तुम्हें चाहिए? जो तुम्हें चाहिए ले लो और जाओ। अरे हमारी लाखों की शांति है, करोड़ो की शांति है। हम भजने में स्थापित हैं। इस मधुर, सूक्ष्म, सुन्दर, कीमती संगीत बज रहा है, तुमसे उलझ कर के हम इसे गँवा दें। तुम्हारी इतनी हैसियत नहीं| तुम जाओ।”

तो जब कबीर खेहते हैं कि राम भजा सो जीता जग में तो इसका आशय ये कदापि न लगाइएगा कि आपको कुछ तौफे, तमगे, उपाधियाँ मिलने लगेंगी कि लोग आ आकर के आपकी तारीफें करने लगेंगे या आपके ऊपर पैसों रुपयों की बौछार होने लगेगी। लोग कैसे हैं वो हम जानते ही हैं, थोड़ी ही देर पहले हमने कहा था कि ९५% लोग ९५% मन ९५% समय ऐसे ही होते हैं कि पढ़ पढ़ कर भी भज नहीं पाते। ये मन क्या जाने भजने की कीमत को? जो मन शोर का ही आदि हो और शोर का ही अभ्यस्त हो वो क्या जाने मौन की कीमत को? उनसे कुछ नहीं मिलेगा।

आप जीतोगे इस तरह की आपको उनसे कुछ मिलने की अब उम्मीद भी नहीं रह जाएगी। ऐसे नहीं जीतोगे की उनसे मिलने लग गया, ऐसे जीतोगे की मिलने की उम्मीद ही नहीं रही।

क्या कहा था कृष्ण ने, “निराशी निर्ममो युध्यस्व विगतज्वरः|” यहाँ कृष्ण कह रहे हैं ‘युध्यस्व’ वो युद्ध की बात नहीं कर रहे हैं वो खेलने की ही बात कर रहे हैं। कृष्ण के लिए युद्ध, युद्ध नहीं है क्रीड़ा है। उम्मीद नहीं है खेल रहे हैं। उम्मीद नहीं है, उम्मीद का मतलब तो ये हुआ कि याचक हैं, माँग रहे हैं कुछ मिल जाए। जीते हुए हैं, अब खेल रहे हैं। राम भजा जो जीता जग में।



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