सोचने के अलावा और कोई चिंता नहीं होती

सारी झुंझलाहट तुम्हारी शुरू किस क्षण होती है, कभी देखा तुमने ये? तुम्हारी सारी झुंझलाहट शुरू कब होती है? तुम सो रहे हो, और तुम्हें होंगी सौ चिंताएँ, दुनिया होगी तुम्हारे लिए बहुत बड़ी मुसीबत, पर जब तक तुम सो रहे हो तब दुनिया है कहाँ? कहाँ है? और मैं गहरी नींद की बात कर रहा हूँ, सपने वगैरह नहीं ले रहे। सारी चिंताएँ किस पल शुरू होती हैं? जिस पल विचार शुरू होता है, जिस पल तुम सोचना शुरू करते हो। और याद रखना सोचना हक़ीकत नहीं है, सोचना कई बार यथार्थ भी नहीं है।

सोचने के अलावा और कोई चिंता नहीं होती। चिंता को तुम सोचने से अलग मत समझ लेना, जब तुम कहो कि मुझे चिंता हो रही है, तो उसका अर्थ बस इतना ही है कि तुम चिंतित विचार कर रहे हो। चिंता, विचार और सोच से अलग कुछ भी नहीं होती। और अगर तुम अभी चिंतित होना चाहते हो तो हो सकते हो; आँख बंद करो और जितनी आफतों की कल्पना कर सकते हो कर लो, फिर देखो यहीं बैठे-बैठे चिंतित हो जाओगे। करो, प्रयोग करना चाहते हो तो अभी करके देख लो?

तुम्हारे जितने भी मनोभाव होते हैं, वो सब विचार हैं,  प्रमाण ये है कि तुम यहाँ बैठे-बैठे चाहो तो खुश हो सकते हो। जो लोग प्रसन्न होना चाहते हों, वो आँख बंद करें और अतीत की जितनी प्यारी-प्यारी स्मृतियाँ हैं उनका विचार करने लगें; देखो मन अभी कैसे प्रफुल्लित हो जाएगा। और जो लोग दुखी होना चाहते हों वो उन सब घटनाओं को याद कर लें जो तुम्हारे साथ घटी हैं या जिनकी तुम्हें आशंका है कि घट सकती हैं, तथाकथित बुरी घटनाएँ। याद करने भर से दुखी हो जाओगे, अभी दुखी नहीं थे।



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