कल्पनाएँ मत करना

सोचना मतलब समझ का प्रयोग।

सोचना एक क्रिया है, इन द प्रेजेंट मोमेंट, राइट? इट्स एन एक्टिव कंटीन्यूअस वर्ब, राइट? ‘सोचना’

बदली जा सकती है क्या? कोशिश कर के भी, क्या बदली जा सकती है? अगर मुझे दिखाई पड़ ही रहा है, कि ये सफ़ेद है, और ये काला है, तो मैं कोशिश करके क्या उल्टा सोच सकता हूँ?

जो मुझे दिख ही रहा है, उसको अनदेखा करने का कोई तरीका है?

है क्या?

सत्य जान के, अब उसको अनजाना करा जा सकता है क्या? हाँ, तुम अपने आप को भ्रम में रख सकते हो। वो अलग बात है।

तो सोचना, सोचने से मेरा मतलब समझ। मैं समझ रहा हूँ, कि तुम ‘समझ’ कहना चाहते हो। समझ को रिवर्स कर देने का दुनिया में कोई तरीका आज तक खोजे नहीं गया, खोजा जा भी नहीं सकता। जो तुमने एक बार देख लिया तो देख लिया। अब कोशिश कर भी लो, तो उसको अनदेखा नहीं कर सकते। जो जान लिया, अब वो जान लिया। अब उससे नीचे नहीं जा सकते तुम।

तो तुम वही रहोगे जो तुम हो। हाँ, तुम अपने आप को बहुत कष्ट ज़रूर दे सकते हो कि मैं कोशिश कर के दूसरे जैसा हो जाऊँ। मैं उनकी हाँ में हाँ मिला दूँ। मैं उनकी बात काटूँ न। ऐसा करा नहीं जा सकता।

समझ तो समझ है। समझ गए तो समझ गए।

अब समझ के ये भी समझो, कि इस स्थिति में तुमने करना क्या है। मैं तुम्हारी मदद नहीं कर पाउँगा। इतना तो तुम समझते ही हो ना कि तुम समझ गए हो? तो अब इस मुद्दे पर भी अपनी ही इंटेलिजेंस लगाओ कि उचित कर्म क्या है क्योंकि, घरवाले किसके हैं? तुम्हारे। प्रेम की बात किसकी है? तुम्हारी। समझ की बात किसकी है? तुम्हारी। तो उसे समझेगा कौन? तुम।

तो उसमें बस कल्पनाएँ मत करना, नेति नेति वाली गलती मत करना। कि तुमने कल्पना कर ली, कि ये तो घरवाले हैं, तो सही ही कह रहे होंगे। या ये घरवाले हैं, तो इनका दिल नहीं तोड़ना चाहिए। तो कोई भी ऐसी बात। कैसी भी बात जो कल्पना से आ रही हो। कल्पना मत करना।


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