कृष्ण की मुरली दिल में बजती है|

अनहद नाद कानो से नही सुना जाता है| उसी तरीके से संतो के, उपनिषदों के शब्द हैं कानो से नहीं सुने जाते, कहीं और से सुने जाते हैं, ह्रदय से| कृष्ण की मुरली अगर कानो से सुनी जा सकती तो यकीन जानिये कृष्ण से बेहतर मुरली वादक बहुत हैं| शास्त्रीय रूप से मुरली बजाएँगे, तैयारी कर-कर के, रियाज़ अभ्यास कर कर के बजायेंगे| उन्होंने जीवन ही समर्पित कर रखा है मुरली को कृष्ण से बेहतर बजा सकते है| पर उनकी मुरली बस वही होगी जो होंठ, हवा और बाँस का खेल है|

कृष्ण की मुरली दूसरी है, वो दिल में बजती है| और अगर दिल में नहीं बज रही बाहर-बाहर ही सुनाई दे रही है तो आपने कुछ सुना नही| बुल्लेशाह की काफी हो, ऋभु के वचन हो, किसी संत, किसी ऋषि की वाणी हो, जब उसको सुनियेगा तो ऐसे ध्यान से सुनियेगा कि कान बेमानी हो जाएँ, अनुपयोगी हो जाएँ| फिर आप कहें  कि अब कानो पे ध्वनि पड़े न पड़े, शब्द भीतर गूंजने लगा है| शब्द तो माध्यम था, तरीका था, साधन था, आग अब लग गयी| हमारे भीतर लग गयी है| मुरली बज गयी, अब हमारे भीतर बज रही है, अब उसे नहीं रोका जा सकता |



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