शास्त्रों को अक़्ल से नहीं पढ़ते

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प्रश्नकर्ता: सर, एक प्रमुख उपनिषद् में से एक लाइन ली गयी है, उसका अनुवाद है – “The perception of the other is indeed the source of all fear (दूसरे की अनुभूति, वास्तव में स्त्रोत है प्रत्येक डर का)”

वक्ता:  ये बात तो उपनिषद बार-बार बोलते हैं, “जो दूसरा है वही भय है|” जहाँ दूसरा पैदा हुआ वहाँ भय पैदा हो गया| दूसरा मतलब पराया| जहाँ तुमने दूसरे को पराया बनाया, वहीँ पर, उसी क्षण, तुम अपना निर्माण कर लेते हो| दूसरे का निर्माण करते ही तुम अपना निर्माण कर लेते हो और ये जो अपना है जिसको तुम बना लेते हो ये हमेशा उस दूसरे से डरा हुआ रहेगा, दूसरे पर निर्भर है ना|

डर क्या है? ये विचार की मेरा कुछ खो सकता है, मैं किसी पर आश्रित हूँ, जिस पर आश्रित हूँ वो मेरा कुछ छीन सकता है| तुम्हारा होना ही दूसरे पर आश्रित है, तुम हो ही इसीलिए  क्योंकि  दूसरा है, तुम उसी दिन तक हो ना  जिस दिन तक दुनिया है| कोई है यहाँ पर जो ये दावा करे की दुनिया मिट जायगी फिर भी मैं रहूँगा? दुनिया मिट गयी है और तुम टंगे हुए हो, खड़े हो कहीं पर, ऐसा हो सकता है? आश्रित हो न पूरे तरीके से दुनिया पर ?

श्रोता: जी हाँ |

तो सवयं का और जगत का, आदमी एक साथ ही निर्माण करता है और ये जो सवयं है, ये जो अहं है, ये पूरे तरीके से जगत पर आश्रित है अपने होने के लिए भी और अपनी पहचान के लिए भी और यही जो आश्रित होने की मज़बूरी है, यही हमारे जीवन का दुःख है| “मेरा वजूद किसी दूसरे के वजूद से है जिस पर मेरा कोई बस नही”, ये बड़ी मज़बूरी की हालत होती है और हम तड़पते रहते हैं इसीलिए| दूसरा, जीवन में आया नहीं की दुःख आ गया जीवन में और दुसरे से अर्थ दूसरा व्यक्ति या वस्तु से नहीं है, दूसरा मतलब दूसरे का भाव इसीलिए प्रेम तभी जब दूसरा मिट जाए क्योंकि जब दूसरा मिटता है तभी तुम मिटते हो|



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