अधर्म के बढ़ने में भी वो बढ़े और धर्म के बढ़ने में भी

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If desire shall conceal true self,
True self will manifest itself even more.
If desire shall weaken true self,
True self will strengthen itself even more.
If desire shall abandon true self,
True self will be prosperous even more.
If desire shall deprive true self,
True self will give even more.
This is known as the enlightened nature that is subtle yet profound.
Gentleness overcomes strength, and the meek overcomes the strong.
Just as fish live in deep water and cannot survive after being taken out of the depths.
And the powerful weapons of a country should not be displayed,
Just like one’s true nature cannot be revealed to be seen.

~ Tao Te Ching

  “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत !

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानम सृज्याहम !!”

~भागवद गीता

वक्ता: कब प्रकट होता हूँ मैं?

श्रोता: जब भी धर्म की हानि होती है|

वक्ता: तो मेरे प्रकट होने की अनिवार्यता क्या है?

श्रोता: धर्म की हानि होना|

वक्ता: “The more there is desire, the true self reveals itself the more. (इक्षा जितनी ज्यादा रहेगी, सत्य और अधिक पता चलता है)” समझ रहे हैं आप बात को?

वो कुछ नहीं है, और जो कुछ बढ़ रहा है उसके बढ़ने में वही बढ़ रहा है| दोहराऊँगा, “वो कुछ भी नहीं है, और जो कुछ भी बढ़ रहा है, धर्म बढ़ता हो तो धर्म, और अधर्म बढ़ता हो तो अधर्म, उसके बढ़ने में वही बढ़ रहा है|”

कामना भी बढ़ती है तो वही बढ़ रहा है, त्याग बढ़ता है तो भी वही बढ़ रहा है| साधू बढ़ता है तो भी वही बढ़ रहा है, शैतान बढ़ता है तो भी वही बढ़ रहा है| ये भूल न की जाए की किसी भी प्रकार से ‘ट्रू सेल्फ’ का दायरा निश्चित कर दिया जाए| आदमी ने कई बार ये कोशिश करी है| आदमी कहता है कि त्याग तो वो हमे देता है,  वासनाएँ  हमारी हैं – नहीं वासनाएँ भी तुम्हे उसी ने दी हैं| आदमी कहता है, “कृपालू वो है, और हिंसक हम हैं”- न, मारता भी वही है| आदमी कहता है फ़रिश्ते उसके हैं और शैतान कहीं और से आया है – न, शैतान भी उसी ने बनाया है|

ये गलती कभी न की जाए की किसी भी स्तिथि को उसके अलावा किसी और का काम समझा जाए, निर्मम हत्याएँ  हो रही हैं, वही करवा रहा है, छोटे-छोटे बचे जान गँवा रहे हैं, पैदा होने से पहले मर रहे हैं, वही मार रहा है| घोर अन्याय हो रहे हैं, वही कर रहा है|

आपका मन है जो तस्वीर को पूरा नहीं देख पा रहा, इस कारण वाय्तिथ है| आप नहीं जान पा रहे की वास्तव में क्या हो रहा है – वो (सत्य)जनता है| एक बात पक्की है कि जो भी होना है, जिस किसी को भी आप कहेंगे “हैप्पेनिंग” या जिस किसी को भी आप कहेंगे ये “है”, “एग्जिस्टेंस” – “All happening is the Self , all existence is the Self.” (सभी घटनाएँ आत्मा हैं, समस्त अस्तित्व आत्मा है|)

कृपा  करके परमात्मा की वो वाली छवि मत बना लीजिए की कृपालु,  परवरदिगार  बैठा है जो आपका बच्चे  की तरह ख्याल रखेगा| इसीलिए लओत्जू  ने कहा है, “ताओ|” कुछ हद तक ताओ एक नियम की तरह है| वो एक नियम है, वो सार है सब कुछ का, जिसको आप भला कहते हो उसका भी और जिसको आप बुरे से बुरा कहते हो उसका भी|

भलाई बढ़ती है तो वो भलाई में प्रकट हो जाता है, बुराई बढ़ती है तो बुराई में प्रकट हो जाता है|



सत्र देखें: आचार्य प्रशांत: अधर्म के बढ़ने में भी वो बढ़े और धर्म के बढ़ने में भी


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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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