हम शरीर तक का तथ्य तो बर्दाश्त नहीं कर पाते, हम परम सत्य क्या बर्दाश्त करेंगे?

वैलेंटाइन डे मनाने की एक ही जगह हो सकती है, “मंदिर”, “मस्जिद”। जाओ, खड़े हो जाओ जीसस के सामने, और बोलो, “आई लव यू”, और कहाँ बोलोगे? और कौन है प्यार के काबिल?

तुम्हारा “आई लव यू” सिर्फ एक रोमांटिक छवि को है, एक ऐसी छवि को, जो कहीं है नहीं। जिसको आई लव यू बोल रहे हो, उसके शरीर का ही सत्य अगर बिलकुल खुल जाए, तो तुम्हारा ‘आई लव यू’, अभी गिर जाएगा, खत्म हो जाएगा। ये तो भली बात है कि शरीर कपड़ों के नीचे छुपा रहता है। ये तो भली बात है, कि भीतर जो मांस-मज्जा है, वो त्वचा के भीतर ही छुपी रहती है। सब अगर अभी खुल जाए, तो बताना ‘आई लव यू’ बोल पाओगे? और तब अगर आई लव यू बोल पाओ, तो मान लेंगे।

कृष्ण तब हुए तुम, जब प्रकृति से एक होने के लिए, प्रकृति को तुम्हें आवृत ना करना पड़े, तब कृष्णत्व है। जब सामने वाले को पूरी तरह जानते हो, और फिर भी वो प्यारा लगे, तो  तुम कृष्ण हुए। हमें तो कोई प्यारा लगता ही इसी शर्त पर है, कि उसका कुछ छिपा हुआ हो। नंगा शरीर तुम्हें उतनी उत्तेजना नहीं देता होगा, जितनी अधनंगा देता है। कभी गौर किया है? कृष्ण तुम तब हुए जब तुम्हें सब दिख जाए, पूर्ण नग्न, एक एक तथ्य जान गए जीवन का। सब खुला सा है। आँखें खुली हुई हैं, मन ध्यानरत है। और फिर कहते हो कि अब होगा रास। तब हुए तुम कृष्ण, ऐसे थोड़े ही कि प्रेम करने के लिए भी चीज़ें छुपा रहे हैं|

हम शरीर तक का तथ्य तो बर्दाश्त नहीं कर पाते, हम परम सत्य क्या बर्दाश्त करेंगे?

प्रेमी वही कर रहा है, जो गुरु का काम है। काट रहा है| तुम्हारे सारे दुर्गुण हटा रहा है, तुम्हारे सारे संस्कारों से तुम्हें मुक्त कर रहा है। और जो ये ना करे, उसको प्रेमी बना मत लेना।

हम सम्भोग को उच्चतम का पर्याय बनाते हैं। कौन है उच्चतम? परमात्मा। तो जब वो नहीं मिल रहा होता, जब राह गलत चुन ली होती है, तो उस उच्चतम की एक झलक हम शरीर के माध्यम से पाना चाहते हैं। इसीलिए गड़बड़ हो जाती है। इसीलिए  सेक्स हमारी ज़िन्दगी में इतना बड़ा मुद्दा बन जाता है। क्योंकि जो वास्तविक परमात्मा है वो तो है नहीं, तो सम्भोग के क्षण में हम कहते हैं कि किसी तरीके से उस गहन शान्ति की एक झलक मिल जाए| वो जो अतीन्द्रिय मौज होती है, उसकी एक झांकी देखने को मिल जाए| जब वो मौज दिन भर उपलब्ध होती है तो तुम दो क्षण के लिए नहीं तड़पते। फिर तुम ये नहीं कहते कि इतना आयोजन करूँ ताकि एक सेकेंड या दो सेकेंड को वो मौज उपलब्द हो पाए, तुम कहते हो कि वो तो पूरे दिन मिली हुई है, “आई फील ओर्गाज्मिक  द होल डे।”

स्त्री की तरफ भी आकर्षित इसलिए होते हो, बार बार दोहरा के बोल रहा हूँ, क्योंकि उसके माध्यम से कुछ ऐसा पा लेना चाहते हो जो कुछ आगे का है। वो, वो दे नहीं पाती, तो हताश हो जाते हो। जिस भी वस्तु की तरफ आकर्षित हो रहे हो, तुम्हें वो वस्तु नहीं चाहिए, उसके माध्यम से कुछ चाहिए। वो वस्तु, वो दे नहीं पाती, तुम्हें फिर निराशा मिलती है।



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