पता नहीं चलता है क्या गलत है और क्या सही

श्रोता: सर, ये बहुत बड़ा सवाल है, पता नहीं चलता है क्या गलत है और क्या सही।

वक्ता: ये बहुत बड़ा सवाल नहीं है, क्योंकी तुम्हारे लिए ये एक स्वचालित प्रक्रिया है जो तुमने कहीं से उधार पर ले ली है। आपके लिए, गलत और सही, हमेशा बाहर से ही आता है। इसलिए, अभी तुमको बड़ी दिक्क्त हो रही है की पता कैसे चलेगा कि गलत क्या, और सही क्या?

बचपन से ही गलत और सही, तुमको बाहर से ही कहीं से मिल गया था? किसी ने सिखा दिया, “सदा सच बोलो, ये सही बात हो गयी । बड़ों का आदर करो, ये सही बात है । चोरी मत करो, वो गलत बात है।” और तुम्हारे लिए बहुत आसान हो गयी ज़िंदगी । तुम्हें खुद ये कभी समझना ही नहीं पड़ा, तुम्हें खुद ये कभी जानना ही नहीं पड़ा, कि क्या है, जो उचित है? क्योंकि तुम्हारे सारे सही और गलत लगातार बाहर से आते रहे। और अब मैं कह रहा हूँ, कि सही गलत कुछ है ही नहीं। सिर्फ तुम हो, जीवन है, और तुम्हारा जीवन के साथ अनुबंध है। तो तुम्हें बड़ी दिक्क्त आ रही है, कि सर ठीक है, जीवन के साथ एंगेजमेंट तो कर लेंगे, तो फिर ये पता कैसे चलेगा कि ये सही हुआ कि गलत हुआ|

मैं तुमसे कह रहा हूँ, कि तुम हो, तुम्हारी प्यास है, और पानी है, उसको अनुभव करो। और तुम कह रहे हो कि मुझे पता कैसे चलेगा कि मेरी प्यास बुझी कि नहीं। अरे बुझेगी तो पता चल जाएगा भाई।



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