आत्मा कहाँ है?

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प्रश्न: आत्मा की जो छवि होती है, जिसको हम अपना आत्म कहते हैं, वो छवि होती है जैसे आकाश की छवि घड़े में, पानी में मिल जाती है। तो घड़े को लगता है कि उसके अन्दर आकाश है। वैसे ही हमें लगता है कि हमारे अन्दर आत्मा है क्योंकि वो छवि है आत्मा की। लेकिन आत्मा जो है, वो सर्वव्यापक है और वो छवि है, जिसे हम अपनी आत्मा मान के बैठ गए हैं। तो फिर ये भ्रम वाली बात कैसी है?

वक्ता: भ्रम वाली बात ये है कि आप आत्मा नहीं बोलते हो, आप “मेरी आत्मा” बोलते हो। और मेरी से आपका मतलब होता है; मेरा शरीर। आपने आत्मा को भी शरीर के अन्दर बैठा दिया है। जब घड़े में आकाश प्रतिबिंबित होता है, तो घड़े को ये लगता है कि मेरा आकाश है; “मेरा” क्योंकि दिखा तो मेरे अन्दर ही है न।

श्रोता: तो जो चैतन्य है, जिसको हम कहेंगे जागरूकता, वो भी…वो सब भी तो सिर्फ भ्रम ही हुए न फिर।

वक्ता: हाँ, भ्रम ही हुए।

श्रोता१: तो हमारी समझ भी फिर भ्रम ही हुई?

वक्ता: तो समझ, मन, बुद्धि थोड़ी ही है। ‘आपकी समझ’ थोड़ी ही है। जैसे चेतना आपकी नहीं होती, वैसे ही समझ भी आपकी नहीं होती है। जब तक ‘समझ आपकी है’, तब तक वो सिर्फ़ आपकी मान्यता है, मत है। वो समझ नहीं है। समझ अवैयक्तिक होती है। आपकी नहीं होती है। धर्म के इतिहास में सबसे बड़ी भूल यही हुई है कि आदमी ने आत्मा को शरीर के भीतर अवस्थित कर दिया है।

देखिये, आत्मा की जो पूरी बात है वो कही ही इसलिए गई थी कि आपको समझ में आए कि ये सब कुछ जो सब दिखाई देता है, जो पदार्थ है, भौतिक है, ये इन्द्रियों से भीतर आता है, इन्द्रियों द्वारा ही निर्मित है, ये पूरा खेल सिर्फ मानसिक है। शरीर भी पदार्थ है। तो आत्मा शब्द ही इसीलिए रचा गया था कि आपको समझ में आए कि शरीर के परे, जगत के परे, पदार्थ के परे, एक परम सत्य है। इसलिए दिया गया “आत्मा”। और होशियारी क्या करी आदमी ने कि आत्मा को अपने भीतर बैठा लिया।

“आत्मा क्या है?”

“वो मेरे कहीं इधर-उधर पाई जाती है, शरीर के भीतर होती है शरीर के भीतर नहीं होती, तो कम से कम मन के भीतर तो होती ही है।”

जिसको देखो वही चिल्ला रहा है -“मेरी आत्मा! मेरी आत्मा!” मेरी आत्मा का क्या मतलब होता है? मेरी आत्मा का क्या मतलब है? अभी जिम से आ रहा था, तो वहाँ भी यही लिखा हुआ था “आओ! अपने शरीर, दिमाग और आत्मा को स्वस्थ करो।” तो जैसे दिमाग है आपका, जैसे शरीर है आपका, वैसे ही आत्मा भी आपकी ही है। और ये बड़ी ज़बरदस्त भूल हुई है। और कुछ हद तक इसके ज़िम्मेदार, जिन्होंने धर्म ग्रन्थ रचे, वो भी हैं।

मैं गीता देख रहा था, उसमें “मई” शब्द का इस्तेमाल किया गया है। अब “मई” का अर्थ ही यही होता है – मुझेमं, मेरे भीतर। तो जैसे ही यह बोल दिया गया कि मेरे भीतर आत्मा स्थित है, तो आदमी को तो यही लगेगा न कि “मेरे भीतर” यानी शरीर के भीतर। तो जो शब्दों का चयन भी है, वो पूरी सावधानी से नहीं किया गया। यही कारण है कि आम लोगों में, जन मानस में यह भ्रम है कि आत्मा कोई हमारी चीज़ है। आत्मा आपकी थोड़ी ही कोई चीज़ है। आपकी कोई आत्मा-वात्मा नहीं होती।

आपकी नहीं है कोई आत्मा। आप आत्मा में स्थित हो और वो आपकी नहीं है।

ये ऐसी सी ही बात है कि नदी की, या सागर की मछली बोले कि, मेरा सागर। अरे! तुम उसके भीतर हो। वो तुम्हारे भीतर थोड़ी ही है। तो आदमी ने दो काम करें हैं। पहला तो, आत्मा को वस्तु बना दिया है। जो पदार्थ है नहीं, जो आकाश में नहीं हो सकती, जो समय और स्थान में नहीं हो सकती, आपने उसको समय और स्थान में डाल दिया है। दूसरा, समय और स्थान में ही नहीं डाला, अपने भीतर और डाल दिया है कि समय और स्थान में भी कहाँ है? यहाँ (शरीर की ओर इंगित करते हुए) हैं कहीं। किडनी के आस-पास। पहले तो वो कोई वस्तु है, और दूसरा, वो वस्तु कहाँ है? वो यहाँ है।

तो आप जितने उदहारण देते हो, दिक्कत क्या है; आप उदहारण जो भी दोगे, वो उदहारण तो मन के भीतर से ही आएँगे। और मन वस्तुओं को ही जानता है। तो आपको अगर आत्मा भी समझानी है, तो आपको वस्तु का ही कोई उदहारण देना पड़ेगा। समझने वाला होशियार न हो, तो वो ये भूल ही जाएगा कि ये उदहारण बस दिया गया है। आत्मा सूरज नहीं होती है। कि वो आत्मा सूरज है, और चमक रही है और हर मन में दिखाई देती है, वो प्रतिबिंबित होती है, और ये सब बातें…। इन्हीं सब बातों के कारण हम फंसे हुए हैं बुरे तरीके से। दुनिया का कोई धर्म ऐसा नहीं है, जिसने ये हरकत नहीं करी है कि उसने अपने से बाहर कोई सत्य बैठा लिया है। अब यही तो आप कर रहे हो कि हम तो ओस की बूँदें हैं। जो धूल-धक्कड़ आ रहा है, वो माया है और जो परम सत्य है, वो बाहर कहीं है। तो यही तो होता है।

हिन्दू जाते हैं और पूजा कर रहे हैं कि, ‘हे भगवान्! हे भगवान!,’ जैसे वो बाहर कहीं है। मुसलमानों में है ही कि अल्लाह कहीं अलग है हम से। उनसे आप बोल दीजिये कि तुम्हीं अल्लाह हो, तो ये बात बड़ी खराब हो जाएगी। इसी बात पर तो मंसूर को मार दिया। और ये चूक, पढ़ने वाले की चूक है। जो आप कह रहे हो कि हमसे बाहर है, आपसे बाहर कहीं नहीं है क्योंकि आपसे बाहर होने का अर्थ ही यही हुआ कि वो कोई और वस्तु है। आपने कोई कोशिश नहीं छोड़ी है परम को, ब्रहम को, अल्लाह को भी वस्तु बना देने में। और आप सोचते हो कि ये धर्म है। ये धर्म नहीं है। ये गहरी से गहरी अधार्मिकता है – विधर्म इसी को कहते हैं।

अगर कोई वास्तव में धार्मिक आदमी होगा, तो आपकी ये सब बातें सुनकर रो पड़ेगा। वो कहेगा, ‘ये तुम कर क्या रहे हो? अरे! जो शब्द लिखा गया, वो शब्द इसलिए इस प्रकार लिखा गया क्योंकि शब्द लिखे ही इस प्रकार जाते हैं। पर हमने ये उम्मीद करी थी कि तुम ज़रा समझदार होंगे, तो बात को समझ जाओगे। हाँ! बिलकुल ठीक है कि ब्रह्मा ने जगत का निर्माण किया। अल्लाह ने संसार की रचना की। अभी इसी प्रकार लिखना पड़ेगा क्योंकि इसी प्रकार लिखा जा सकता है। पर सब लिखने वाले पर ही छोड़ोगे या कुछ पढ़ने वाले की अक्ल पर भी भरोसा करोगे। पढ़ने वाला अक्ल किनारे रख कर पढ़ रहा है? पढ़ने वाले का कोई विवेक है कि नहीं? उसका अपना कोई ध्यान है कि नहीं? या बस तुम यही करोगे कि, ‘’मैं तो बस भई शब्द को जानता हूँ।’’ तो फिर तो तुम रोबोट हो, मशीन हो। शब्द तो मशीन भी जानती है।

श्रोता: तो जैसे आप पहले भी कह रहे थी कि फिफ्टी-फिफ्टी तक तो आओ, तभी तो उसको ग्रहण कर पाओगे।

वक्ता: तो बस यही होता है न। ये बात भी हर धर्म-ग्रन्थ ने कही है हमेशा। आप अमृतबिन्दु उपनिषद् पढ़ रही हैं। शुरू में ही उसमें चेतावनी दी गई होगी कि जो अधिकारी हैं, इसको पढ़ने के, मात्र वही पढ़ें। दिक्कत क्या हुई है कि दुनिया के सारे धर्म-ग्रन्थ ऐसे लोगों के हाथों में पड़ गए है, जो उनको पढ़ने के अधिकारी ही नहीं थे। उन्होंने उनको न सिर्फ पढ़ा है बल्कि उन पर भाष्य भी लिख दिए हैं। और ये भी दावा कर दिया है कि, ‘’हम विशेषज्ञ हैं, हमसे पूछो कि इनका अर्थ क्या है।’’ तो ज़बरदस्त अनर्थ हुए हैं। हर धर्म में ज़बरदस्त अनर्थ हुए हैं! एक-एक पंक्ति, नाश उसका लगा दिया गया है। बात वो कुछ और इशारा कर रही है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि एक पंक्ति नहीं है जिसका अर्थ वास्तव में लिया जाता हो, जो कहने वाले ने कहना चाहा था। क्योंकि अर्थ आप तभी समझ सकते हो, जब आप वहीं स्थित हो, जाओ जहाँ से वो पंक्ति आ रही है तो जिस मौन से, जिस सत्य से वो पंक्ति निकली है, आप कभी वहाँ हो करके उसको नहीं देखते हो।

अभी एक सज्जन के बारे में कुछ देख रहा था। वो अपना कोई टीवी चैनल भी चलाते हैं। वो दनादन उपनिषद् और वेद कोट(उद्धरण) कर रहे थे, कुरआन से तो दनादन उद्धरण करा उन्होंने। एक पैसे की उनको समझ नहीं थी। स्पष्ट है, उन्होंने जितना भी उद्धरण किया, उनमें से एक भी पंक्ति उनको पता नहीं है। पर इतना उद्धरण किया कि पूछो नहीं। इतना उद्धरण करा। और बहुत ऊंची जगह पर बैठे हैं ये लोग। और ये बड़े इज्ज़तदार हो गए हैं। इनका जो शब्द है, वो आखिरी माना जाता है कि इन्होने इसका जो अर्थ बता दिया तो यही मतलब होगा। और क्या मतलब हो सकता है? यही मतलब होगा। अरे नहीं! वो मतलब नहीं है।

धर्म की पूरी यात्रा है ये जताने की- कि वस्तु के पार भी, कुछ है, ही कुछ है। और मूढ़ आदमी पहला काम ये करता है कि वो हर चीज़ को एक वस्तु बनाता है। हर बात को वो एक वस्तु बनाएगा। भले ही वो ये दावा कर रहा हो कि मैं वस्तु नहीं बनाना चाहता। भले ही वो ये कहना चाह रहा हो कि कोई नाम नहीं दिया जा सकता। भले ही वो ये कह रहा हो कि ओई रूप नहीं है, कोई आकर नहीं है, कोई चेहरा नहीं है। पर मन ही मन वो सब बनाके बैठा है। ज़रा आप उसकी बातों पे ध्यान दीजिये, दिख जाएगा कि ये तो सब कुछ करके बैठा हुआ है। और ये भी वो क्यों कह रहा है कि आकर, रूप, प्रतिमा नहीं हो सकती? क्योंकि ये भी शब्दों में लिखा हुआ है। पर वो शब्द कहाँ तक जातें है, ये वो ज़रा नहीं समझ पा रहा। यही कारण है कि धर्म-धर्म में भेद है। नहीं तो एक प्रतिशत का अनतर नहीं हो सकता। पर आज आपको बहुत बड़े-बड़े अनतर दिखाई देते हैं। अनतर कोई है ही नहीं क्योंकि एक ही जगह है जहाँ पर बैठ करके सारी बातें बोलीं जाती हैं। जब बोलीं जाती हैं, तब देश-काल, परिस्थिति का अंतर होता है इसीलिए शब्द थोड़े अलग-अलग हो जाते हैं। कहने के तरीके अलग हो जाते हैं। आप कब बोल रहे हो, किससे बोल रहे हो, इस पर निर्भर करते हुए बोलने का तरीका, लहजा अलग हो सकता है। लेकिन जिसने ही कहा है उसने एक ही स्थान पर बैठ कर कहा है। वही जैसे कबीर कहते हैं – शून्य शिखर।

जिसने भी कहा है, हमेशा शून्य शिखर पर बैठ कर कहा है। तो बातें अलग हो नहीं सकती। अलग आपको दिखती हैं, यही प्रमाण है कि आप नसमझ हो। जिसको ही ये दिखता हो कि बातें अलग-अलग हैं, वही नसमझ है। आपके भीतर परिपक्वता आ रही है, इसका आपको एक लक्षण ये मिलेगा कि आपको भेद दिखने बंद हो जाएंगे। विविधता दिखनी बंद हो जाएगी। आपको जो कुछ अलग-अलग दिखता था, वो एक दिखने लगेगा। ये इस बात का लक्षण होगा, द्योतक होगा कि अब आप में परिपक्वता आ रही है। समझ रहे हो?

जब तक अलग-अलग दिख रहे हैं, दो दिख रहे हैं, चार दिख रहे हैं, तब तक समझना कि कुछ बात बनी नहीं। जब तक लगे कि यहाँ कुछ और कहा गया है, और वहाँ कुछ और कहा गया है, तब तक समझना कि बात बनी नहीं। जब तक लगे कि कुछ भी कहा गया है, तब तक भी समझना कि बात बनी नहीं।

श्रोता: सर, ये तो हम समझ ही रहे हैं न कि मन खाली होगा और शुद्ध होगा और साफ़ होगा तभी,…

वक्ता: शुद्ध का मतलब क्या होता है? थोड़ा ध्यान से देखिएगा।

श्रोत्ता: जहाँ पर साफ़-साफ़ दिख रहा है।

वक्ता: दिखने का क्या मतलब होता है?

श्रोता: कि मन को तुम समझ पा रहे हो।

वक्ता: समझ पाने का क्या अर्थ है?

श्रोता: कि…

वक्ता: चलते रहिये ऐसे ही, अंततः आप यही पाएंगी कि कोई छवि पकड़ रखी है। और जहाँ छवि पकड़ रखी है, वहाँ कुछ समझा नहीं है। वहाँ कुछ समझा नहीं है। छवि तो मुर्दा होती है न। वो जीवन में आपके काम नहीं आएगी। जीवन में तो कुछ जीवित चीज़ ही काम आती है।

श्रोता: जैसे ये पंक्ति में कुछ था न जिसमें मन और बुद्धि और विचार को भी भ्रम कहा, आत्मा को भी भ्रम कहा। तो वो किस समझ से कहा, मैं ये समझने की कोशिश कर रही हूँ।

वक्ता: देखिये, मैं बात आपसे बोल दूंगा, ठीक है। आपको कुछ शब्द शायद और मिल जाएंगे। लेकिन होगा क्या, जीवन लगातार एक नयी चुनौती है। वो शब्द आपके कुछ विशेष काम नहीं आएँगे। अभी आप एक बहुत शांत और स्थिर आवाज़ में बोल रहीं होंगी। कक्षा में जाते ही आप पाएंगी कि आप भड़क गई हैं क्योंकि ये शब्द जो हैं, ये तो एक ही हैं न। शब्दों को तो नहीं पता न कि स्थिति बदल गई है। जीवन लगातार बदल रहा है। शब्द को क्या पता कि अब आप किस कक्षा में आ गए हो। शब्द तो एक है। तो आपको जो कुछ मिला है, वो आपके किसी काम नहीं आएगा। ये जितनी अभी शान्ति और स्थिरता प्रतीत हो रही है, ये ऐसे विलुप्त हो जाएगी। ये होता है क्योंकि हमने इज्ज़त दे करके, धारणाएं बना-बना करके शब्दों को पकड़ लिया है और हम नहीं जानते कि ये शब्द किधर को ले जा रहे हैं।

अच्छा ठीक-ठीक अपनेआप से सवाल करिए। बड़ा छोटा सा शब्द है प्रेम। बताइए क्या है? और ईमानदार रहिएगा, ये नहीं कि आपने उसकी कोई परिभाषा दे दी। जब भी मैंने ये प्रयोग किया है, मैं पाता हूँ कि अंततः आपके पास एक छवि बचती है, जिसको आपने प्रेम का नाम दे रखा है। अब छवि तो मुर्दा है। करिए! क्या है प्रेम? बताइए। या तो शब्द बचेंगे या छवि बचेगी।

प्रेम क्या है? ये वास्तव में आप तभी जानेंगे यदि प्रेम कहते ही, ये शब्द कान में पड़ते ही, कुछ नाच सा उठे। कुछ खनक आ जाए। मैंने अभी कहा था न कि जिसने पहली बार आत्मा को खोजा होगा, उसको एक हज़ार वाट का झटका लगा होगा क्योंकि उसके लिए वो शब्द भर नहीं था। शब्द बाद में आया; खोज पहले हुई। खोज पहले हुई अब उस खोज को निरूपित करना है, दूसरों तक देना है। तो आपने क्या करा उस खोज के ऊपर एक…?

श्रोता: शब्द दे दिया।

वक्ता: शब्द रख दिया। तो जैस ही आत्मा जाना होगा, एक हज़ार वाट का झटका लगा होगा।

श्रोता: जब न्युटन को गुरुत्वाकर्षण के बारे में पता लगा होगा,..

आचार्य जी: तो सोचिये न! कि आर्केमेडिस को सिर्फ इतना ही पता लगा था कि उछाल का क्या सिद्धांत है, तो वो नंगा होकर दौड़ पड़ा था। तो जिसको आत्मा का पहला पता लगा होगा, वो कैसा हो गया होगा? आपको तो कुछ नहीं होता आत्मा सुन के। आप बोलोगे- “आत्मा। क्या आत्मा?” आप बोल जाते हो “साफ़ मन”। जिसने पहली बार वास्तव में “साफ़ मन” को जाना होगा, उसमें स्थित हुआ होगा, वो तो पगला गया होगा। नाचने लग गया होगा। या उसको लकवा मार गया होगा, वो जड़वत हो गया होगा। यूँ बैठ गया होगा कि अब करने को क्या बचा? पर कुछ विशेष हुआ होगा जैसे कि इक विस्फोट। आप बोल जाते हो “वो जो साफ़ मन है,” अब साफ़ मन का क्या मतलब है? कि मुंह से स और फ बोल दिया। स और फ से साफ़ मन हो गया। हमारे एक मित्र हैं, यहीं कमरे में आया करते हैं। वो दनादन, किलो के भाव-आनंद मुक्ति, रौशनी, तेज, जोत,…। क्या? कुछ मिल रहा है तुम्हें इससे? कुछ मिल रहा है? जिसने आनंद को अनुभव करा, उसका अनुभव पहले आता है या शब्द पहले आता है? जल्दी से बोलिए।

श्रोतागण: अनुभव।

वक्ता: अब ये तो काम चलाऊ बात है कि उसको कुछ कहना है, तो आपने बोल दिया कि अ-नु-भ-व, आ-न-न्द। तो पहले क्या आना चाहिए? पहले जीवन में डूबना होगा न? फिर शब्द न भी दो तो क्या हो गया? रमण महर्षि के हाथ में रिभु गीता लगी; अपने आश्रम में पहुँचने के कई साल बाद। वो बोलते थे कि ये जब मिली तो मुझे यही पता लगा कि, ‘’ये सब तो मैं सोलह साल की उम्र से जानता हूँ। बोले जानता मैं तब भी था, शब्द नहीं थे मेरे पास। पर अब ये मेरे हाथ लगी है, तो मुझे पता चला है कि अच्छा! उस चीज़ को ये कहते हैं।’’  तो ये आदमी अब पक्का है। इसको वस्तु पहले मिली है, नाम बाद में मिला है। हमें क्या मिलता है पहले?

श्रोता: वस्तु।

वक्ता: हमें मिलता है नाम। और फिर हम उस नाम के पीछे..।

“नाम ही तो वस्तु है।” “नाम मिल गया, हो गया। ठीक है।”

“शुद्ध बुद्धि!” अरे यार! तुम अशुद्ध ही पा लो पहले। तुम अशुद्ध ही पा लो। तुम इतनी ज़ोर से बोल रहे हो ‘शुद्ध बुद्धि,’ चेहरे से मूढ़ता चू रही है और शुद्ध बुद्धि। क्यों? ये नहीं है कि आप किसी और को धोखा दे रही हैं, दिक्कत बस ये है कि ये आपके काम नहीं आएंगी बातें।

मैं जिस बात को सौ बार ज़ोर देकर कह रहा हूँ, उसको समझिये न। आपको टाइम पास करना है, जपुजी पढ़ के या आपको ज़िन्दगी जीनी है? आपको ज़िन्दगी जीनी है न। नानक भी यही चाहते थे कि जो जिए, मौज में जिए, आनंद को पाए। यही चाहते थे न। तो आपको वो तो मिल नहीं रहा है। अब आप रट लो पूरी जपुजी तो क्या मिल गया आपको? आपको वो मिल रहा है जो नानक को मिला? जपुजी पहले आई या पहले नानक की अनुभूति आई? जल्दी से बोलिए। नानक की अनुभूति से जपुजी फूटी न। तीन दिन पानी में रहे, बाहर आए, बोले-कुछ बात कहनी है। कुछ पता लगा है। तो पहले क्या हुआ? शब्द आए या कुछ पता लगा? जल्दी से बताइए।

श्रोतागण: पता लगा।

वक्ता: पहले पता लगा। तो वो ये चाहते हैं कि तुम्हें भी वो मिले, जो उन्हें मिला। वो कहते हैं कि बड़ा मज़ा आया पता लगा तो। थोडा तुम्हें भी पता लगे तो कितना अच्छा रहे। वो ये कह रहे हैं। और आप कह रहे हो कि – “पता लगे या न लगे, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्या होता है पता लग के? कुछ नहीं होता।”

अब आपके पास शब्द नहीं भी है तो क्या फर्क पड़ गया? करना क्या है शब्द नहीं है तो? एक बीमार आदमी है, ठीक है। और वो बैठ के चिल्ला रहा है – “स्वास्थ्य! स्वास्थ्य! स्वास्थ्य!” और दूसरी ओर एक बच्चा है। उसके पास शब्द ही नहीं है। वो खेल रहा है अपने स्वास्थ्य में। कैसा होना है आपको? एक सड़ा गला, बीमार आदमी जो स्वास्थ्य-स्वास्थ्य चिल्ला रहा है या बच्चेनुमा जिसके पास शब्द तो नहीं है ज़्यादा पर वो मस्त खेल रहा है। क्या होना है?

श्रोता: बच्चे जैसा।

वक्ता: पर हमने तो तय कर रखा है कि हम सड़े गले बीमार रहेंगे और स्वास्थ्य-स्वास्थ्य चिल्लायेंगे। और स्वास्थ्य की प्रार्थना है उसकी – (आवाज़ को तेज़ करके) – “स्वास्थ्य!” संस्कृत में बोलता है वो भाई स्वास्थ्य को, अरबी में बोलता है स्वास्थ्य! कराह-कराह के बोलता है! तो जब तो मौका आता है स्वास्थ्य का, तब तो आप भग लेते हो। जब जीवन मौका देता है कि उतर जाओ प्रेम में, यही क्षण है, तब तो आपके सामने भूत डोलने लगते हैं। तब आपके हाथ-पाँव कांपते हैं और दुनिया भर की बाधाएं सामने आ जाती हैं कि – नहीं! और फिर बाद में बैठ करके आप बाँचो, जो बाँचना है। फिर आप प्रेम सूत्र पढ़ रहे हो, और भक्ति सूत्र पढ़ रहे हो। और जब प्रेम का मौका आया, तब क्यों भागे भाई? क्या होगा भक्ति सूत्र पढ़ के?

श्रोता: प्रेम का मौका, तो तभी पता लगेगा न जब प्रेम का पता रहेगा।

वक्ता: लगातार है। पहले क्या आता है? पहले ज्ञान आता है या पहले जीवन आता है? जीवन है न? आप उसे प्रेम शब्द न भी दीजिये। आप प्रेम शब्द मत लगाइए उसके साथ। ये रहा प्रेम का अवसर, सामने, लगातार है। ज्ञान से थोड़ी ही प्रेम आता है कि आप ज्ञान इक्ख्ठा कर लोगे, तो प्रेम आ जाएगा। मौका तो लगातार है और मौका लगातार भागा जा रहा है, चूका जा रहा है। धूमिल है, उसकी बड़ी मजेदार पंक्ति है। तो उसने पाखंड पर एक पंक्ति कही है:

‘कि जैसे कोई मादा भेड़िया अपने छौने को दूध पिला रही हो और साथ ही साथ किसी मेमने  का सर चबा रही हो। ऐसा तो हमारा जीवन है। शब्द बहुत हैं हमारे पास, पर जीवन कैसा है? जीवन ऐसा ही है कि एक तरफ तो शब्द चल रहे हैं – प्रेम, प्रेम, प्रेम! और दूसरी तरफ किसी का सर चबाया जा रहा है। अरे! ये विस्फोट होते हैं। ज़रा आदर के साथ इन शब्दों का इस्तेमाल किया करिए।

मैंने कहा था न कि एक वर्ग है यहूदियों में जो कहता है कि – इश्वर का नाम ही मत लो। नाम लेते हो, गन्दा कर देते हो। नाम ही मत लीजिये। बोलिए ही मत। दिल में सहेज के रखिये। वो है न ये कि छुपा लो दिल में यूँ प्यार मेरा, कि जैसे मंदिर में लौ दिये की। छुपी-छुपी सी है, चिल्ला नहीं रही है। बहुत करीब जाइएगा तो दिखाई देगी कि मंदिर के दिल में एक हल्का सा दिया जल रहा है और हम ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते हैं कि, “जय राम जी की, अल्लाह-हू-अकबर,” और सड़क पर चिल्लाओ, गाने गाओ, ढोल बजाओ। मिला कुछ नहीं है। कबीर भी गाते थे। कबीर कब गाते थे? बहुत साधारण सा सवाल पूछ रहा हूँ।

कबीर कब गाते थे? कबीर ने कहा – “मन लागो यार फकीरी में।” ठीक, बिलकुल। कबीर ने कब कहा? जब मन लग गया।

तो आपको वो फिर कहाँ से मिलेगा जो कबीर को मिला है? कबीर को मिलता पहले है, गाते बाद में हैं। आपको गाने में ज्यादा रस है, मिलने से कोई मतलब नहीं है। और एक बात बता रहा हूँ – जिस दिन आपको मिलेगा न, उस दिन आप कबीर के गाने गाओगे नहीं। उस दिन आप अपना गाना गाओगे। पक्का जानना कि आज मिल गया क्योंकि आज अपना गाना गाया है।

कबीर ने कब गाया, ये बताओ? कबीर को छूने से पहले बड़ी पात्रता चाहिए न। हम कबीर के पास यूं चले जाते हैं जैसे यार हो अपना। “हाँ भई! कबीर क्या चल रहा है तेरा? और बता? मैच देखा कि नहीं देखा आज?” कौन हैं कबीर? आप जानते हैं कबीर कौन हैं? कबीर कितनी ऊंचाई पर बैठे हैं, इसका हमें अंदाज़ा है?

श्रोता: जैसे हम शाहरुख़ खान की पिक्चर देखते हैं, वैसे ही..

वक्ता: वैसे ही कबीर के गाने सुन लिए। नाच और लो। और कबीर पर ऐसे-ऐसे बढ़िया नाचने वाले गाने बने हैं..पकड़ लो और बिलकुल दनादन। “यो-यो कबीर।” और बुल्लेशाह तो हो ही गए हैं। बुल्लेशाह क्या हैं? बुल्लेशाह आपके नाचने के लिए हैं और क्या हैं? बुल्लेशाह ने तो कुछ कहा ही इसीलिए ताकि आप नाच सको। नाच-नाच के आप आकर्षित कर सको। स्त्री हो तो पुरुष को कर सको, पुरुष हो तो औरत को कर सको। और बुल्लेशाह बोल क्यूँ रहे थे? इसीलिए तो बोल रहे थे कि पार्टियों में उनके गाने चलें। और किसलिए बोला है बुल्लेशाह ने?

बुल्लेशाह के गाना गाने से पहले एक अर्ज़ कर रहा हूँ: ज़रा बुल्लेशाह जैसा जीवन भी जियो। हक़दार बनो। हक़ है? उस आदमी को छूने का भी हक़ है? वो सड़क पर नाचता था। आप कमरा बंद करके नहीं नाच सकते। उसके गुरु ने उसको डांट दिया, निकाल दिया तो वो बावला हो गया था, पागल हो गया था। आपका गुरु आपको निकाल दे, आप गुरु पर पुलिस छोड़ दोगे। गाने आप बुल्लेशाह के गा रहे हो। वो आदमी हट्टा-कट्टा, स्वस्थ, नौजवान होते हुए भी, उसे इज्ज़त की कोई परवाह नहीं। वो स्त्रियों के कपड़े पहन के नाचता था। हाँ! मौज थी। नहीं, रोज़ नहीं। कभी मौज आई, तो कर लिया। आप एक काम ऐसा नहीं कर सकते जिसमें आपकी इज्ज़त पर दाग लगता हो। गाने गाने हैं बुल्लेशाह के -“बुल्ला, कि जाना मैं कौन?”

जीवन पर ध्यान दीजिये। शास्त्र अपनेआप आपसे निकलेंगे। उपनिषद बांचिये भर ही नहीं। ऐसे हो जाइये कि आप उपनिषदों के रचयिता हो जाएं। किसी ने रोक लगाई है क्या? क्यों भई? कहीं से कोई निषेधाज्ञा लागू हुई है कि अब नए उपनिषद् नहीं लिखे जा सकते। तो काहे को रुक गए उपनिषद्? आप इस काबिल क्यों नहीं हो सकते कि उपनिषद् आपसे फूंटें?


सत्र देखें : आचार्य प्रशांत: आत्मा कहाँ है? (Where is Aatma located?)


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