जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय

 

 

New Microsoft Office PowerPoint Presentation (2)या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानी सा निशा पश्यतो मुनेः।।

वो जो सबके लिए रात है, उसमें संयमी जागृत रहता है।

वह जिसमें सब जगे होते हैं, वह दृष्टा मुनि के लिए रात्री है।

वक्ता: भगवद्गीता के दूसरे अध्याय से है। प्रश्न है कि सूफियों के बारे में चर्चा करते हुए आपने कहा था कि रात को जागने का बड़ा महत्त्व है। क्या कृष्ण भी ऐसा ही कुछ कह रहे हैं? रात से क्या अर्थ है? क्या प्राकृतिक रात-दिन की ही बात की जा रही है, या कुछ और अर्थ निहित्त है? कृपया स्पष्ट करें।

एक दृष्टा के, संत के, कृष्ण के, कबीर के वचनों को वैसे ही नहीं सुना जा सकता या पढ़ा जा सकता कि जैसे हमारी आम बोल चाल की भाषा हो। प्रयोग उन्हें भी उन्हीं शब्दों को करना पड़ेगा, जिनका आम जन मानस करता है क्यूँकी भाषा वही है। पर भाषा का अर्थ ही होता है बंटवारा, नानत्व का आ जाना, विविधताओं को देखना, हर शब्द एक अलग वस्तु की ओर इशारा करता है। कृष्ण कौन हैं? कृष्ण वो हैं, जिन्हें बहुत कुछ अलग-अलग दिखता नहीं। कृष्ण वो हैं, जिनके लिए नानत्व, विविधताएँ समाप्त होती जा रही हैं, हो चुकी हैं।

अनेक से पहले संत दो पर आता है और दो के बाद सीधे शून्य पर। उसके अनेक शब्दों को बस दो शब्दों की तरह पढ़ा जाना चाहिए। सत्य और मिथ्या, आत्मा और अनात्मा। वो जो भी कुछ कह रहा हो, भले ही वो बात किसी भी संसारी, वस्तु, विचार की कर रहा हो, लेकिन कभी भी इस भ्रम में मत पड़ के रहियेगा कि बोधवान व्यक्ति बहुत सारी चीज़ों की बातें करेगा। उसे बहुत सारी चीज़ों से कोई प्रयोजन नहीं है क्यूँकी बहुत सारा उसे दिखना कब का बंद हो गया। वो दो की ही बात करेगा भले ही शब्द सैकड़ों प्रयोग किये गए हों। वो दो होंगे: वो जो है और वो जो नहीं है और इन दो के माध्यम से वो आपको ले जाना चाहेगा शून्य में। समझिए इसको।

बात की जा सकती है, कृष्ण बात कर रहे हैं रात की और दिन की, कभी कृष्ण बात करते हैं रथ की और घोड़ों की, कहीं कबीर बात करते हैं चक्की की, मिट्टी की और कुम्हार की। क्या उन्हें कोई उत्सुकता है मिट्टी में कि घोड़ों में, या पानी में या आकाश में? कहीं कबीर बात करते हैं दूध की और छाछ की। क्या उन्हें दूध में कि दही में कि छाछ में बड़ा रस है? कहीं कृष्ण बात करते हैं लकड़ी की, अग्नि की, सूर्य की और चन्द्रमा की। गुरु की भाँती हैं वो अर्जुन के समक्ष। उन्हें क्या प्रयोजन है कि वो दुनिया भर की, इधर-उधर की तमाम वस्तुओं की बातें करें? तो वो जितनी भी बातें कर रहे हैं, उनको प्रतीक की तरह, इशारे की तरह लीजिएगा, बातों पर मत अटक जाइएगा और हर इशारा बस दो ही तरफ़ को जाएगा। वो जो आत्मा है, सत्य है, उसकी ओर और वो जो आपको मात्र भासित हो रहा है, आपका अपना विक्षेप है और किसी की ओर भी इशारा नहीं करेंगे वो।

आप ये भी कह सकते हैं कि जो भी इशारा होगा या तो आत्मा की ओर होगा या मन की ओर होगा। आप ये भी कह सकते हैं कि जो भी इशारा होगा या तो शांत मन की ओर होगा या अव्यवस्थित मन की ओर होगा। अब ये जानते हुए कृष्ण के शब्दों की ओर दोबारा आते हैं।

‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी’ जो सभी के लिए रात्रि है उसमें संयमी जगता है। कृष्ण को नहीं बहुत सरोकार है, उस रात से, जो समय में आती है और समय में चली जाती है। ये रोजाना आने वाले रात –दिन की बात नहीं कर रहे हैं वो। सोना और जागना तो चेतना की आम परिस्थितियाँ हैं। आप कब सोएँ और कब जागें, इसका आपके साधु होने से, संयमी होने से इसका आपकी जाग्रति और बोध से कोई सम्बन्ध नहीं है। कृष्ण उस रात की बात नहीं कर रहे हैं, जो आसमान वाले सूरज के ढलने के बाद आती है। कृष्ण उस रात की बात कर रहे हैं, जो लगातार हमारे चैतन्य में ढली ही रहती है। आँखें खुली हों चाहे आँखें बंद हों, जो कालिमा हमारे मन के आकाश को आवृत्त किये रहती है, कृष्ण उसकी बात कर रहे हैं।

कह रहे हैं कृष्ण ‘या निशा सर्वभूतानां’, जो सबके लिए रात है। क्या है रात? रात प्रतीक है अध्यात्मिक मूर्छा का, रात प्रतीक है न जानने का। ‘तस्यां जागर्ति संयमी’, और वही संयमी है, जो तब जान रहा हो, जो तब जाग रहा हो, जब सब सोए पड़े रहते हैं। अब सब कौन हैं इस पर भी गौर करना आवश्यक है। जब कृष्ण बोलते हैं, तो उनको लोगों से भी बहुत सरोकार नहीं है। वो कह रहे हैं ‘सर्वभूतानां’, समस्त प्रकृति सोई पड़ी रहती है। आत्मा माने पुरुष, मन माने प्रकृति।

जब पूरा मन सोया पड़ा रहे, उस समय जो जगे सो संयमी।

संयमी कौन? ये संयमी कोई व्यक्ति नहीं क्यूँकी मैं दोहरा रहा हूँ कृष्ण को व्यक्तियों से कोई प्रयोजन है नहीं। जब कृष्ण बोलें तो बात होगी आत्मा की और मिथ्या की, भ्रम की। व्यक्तियों की बात नहीं करते कृष्ण, उन्हें व्यक्तियों से क्या लेना-देना। कृष्ण वही, जिसने व्यक्तियों के तल पर सोचना ही छोड़ दिया हो। जिसे व्यक्ति दिखाई ही न देते हों। व्यक्ति तो अर्जुन को दिखाई दे रहे हैं। वो इसी कारण व्यथित है। व्यक्ति तो अर्जुन को दिखाई दे रहे हैं, वो इसी कारण गांडीव नहीं उठा सकता। कृष्ण को व्यक्ति दिखाई ही नहीं दे रहे। कृष्ण कहते हैं कि, ‘’कहाँ? तुम किन व्यक्तियों की बात कर रहे हो? मुझे तो कहीं दिखते नहीं। तुम जिनको कह रहे हो कि मर जाएँगे, मैं तो समझता हूँ कि उन्होनें कभी जन्म ही नहीं लिया, वो सदा से थे। तुम जिनको कह रहे हो कि तुम्हारे भाई बांधव हैं, मैं तो कह रहा हूँ कि उनको मारा जा ही नहीं सकता।‘’ व्यक्तियों की भाषा में बात करते नहीं कृष्ण।

ये पूरा श्लोक और पूरी भगवद्गीता को इसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए। जब मन पर गहरी तमसा छाई रहती है, उस समय भी आत्मा निरंतर जगी हुई है, मात्र वही सत्य है। मन जिसको अपना जगना कहता है, वो भी मिथ्या है और मन जिसको अपना सोना कहता है वो भी मिथ्या है। ये तो बस चेतना की बदलती हुई अवस्थाएँ हैं, और जो बदल जाएँ वो झूठ। चेतना की सभी अवस्थाएँ झूठ हैं। हाँ, जिस प्रकाश से वो सारी अवस्थाएँ आलोकित होती हैं, वो प्रकाश मात्र सत्य है और वो प्रकाश आत्मा का है।

 ‘यस्यां जाग्रति भूतानी सा निशा पश्यतो मुनेः’ जब सब अपनेआप को जगा हुआ समझें, उस अवस्था को, उस समय को भी मुनि रात्रि ही कहता है क्यूँकी हमारे लिए जगना क्या है? हमारे लिए जागना यही है कि भौतिक शरीर पर दो जो भौतिक आँखें हैं, वो खुली हुई हैं तो हम कह देते हैं कि हम जगे हुए हैं। मुनि वो, जो इस जगने को जगना माने नहीं और ये बात धारणा की नहीं है कि उसकी धारणा ये है कि तुम जगे हुए नहीं हो। मुनि वो, जो साफ़-साफ़ देख पाए कि खुली आँखों से जो कुछ तुम्हें दिखता है, वो तुम्हारे अपने ही संकल्प-विकल्प हैं। वो प्रकाशित भले ही आपको तत्त्व से हो रहे हों, पर उनको नाम-रूप तुमने खुद ही दे दिए हैं। उनमें कोई सत्य नहीं। उनका प्रकाश भले ही आत्मा का हो, पर उनकी सीमाएँ और विविधताएँ तुमने गढ़ी हैं। तो इसीलिए खुली आँखों से तुम जो भी देखते हो, उसको मुनि बहुत महत्त्व, बहुत प्राथमिकता नहीं दे सकता।

कृष्ण कह रहे हैं कि मुनि वो जिसकी जगने-सोने की परिभाषा वास्तविक है। जिसको इन्द्रियों ने छल नहीं लिया है। जो इतनी स्थूल बात नहीं करता कि आँख खुलने भर से अपना जागरण माने। मुनि वो, जो ये अच्छे से जानता है कि दुनिया भर में ये तमाम लोग, जो खुली आँखों के साथ घूम रहे हैं, वास्तव में गहरी मूर्छा से बाधित हैं। मुनि वो जो ये अच्छे से समझता हो कि चाहे आँख खुली हो या आँख बंद हो, तम्हारा स्वप्न लगातार कायम रहता है, बस दृश्य बदल जाते हैं और स्वप्न में दृश्यों के बदलने को या एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न में चले जाने को जागरण नहीं कहते। मुनि वो, जिसके लिए जागरण का अर्थ ये नहीं है कि स्वप्न बदल गए बल्कि ये है कि स्वप्न अब नहीं रहे। तो कृप्या इस श्लोक का सम्बन्ध भौतिक या प्राकृतिक दिन-रात से बिलकुल न जोड़ें। कृष्ण नहीं कह रहे हैं कि मध्य रात्रि की साधना या रात्रि भर के जगने भर से जीवन में कोई क्रांति आ जाएगी या कोई सिद्धि प्राप्त हो जाएगी।

हाँ, ये सत्य है कि मैंने कहा था कि सूफी पद्यति में रात्रि जागरण का बड़ा महत्त्व है, पर वो इसीलिए रहा है क्यूँकी साधक को शान्ति का जो माहौल चाहिए, वो बहुदा उसे रात्रि में ही सुलभ हो पाता है। संसार सोया पड़ा होता है, तो साधक को बहुत ज़्यादा विक्षेपों का सामना नहीं करना पड़ता। कान में आवाजें कम आती हैं, आँखों के सामने दृश्य कम रहते हैं ,दुनियादारी के झंझट थोड़े कम रहते हैं पर वो बात बहुत महत्त्व की नहीं है। अगर यही सारी स्थितियां दिन के समय उपलब्ध हो जाएँ, तो रात्री को जगने की आवश्यकता कदाचित कम हो जाएगी। रात्रि और दिन तो बस मानसिक हैं, कहीं बाहर नहीं हैं और जो कुछ मानसिक है, वो प्राथमिक कैसे हो सकता है? कैसे उसे बहुत गंभीरता से लिया जा सकता है? कैसे कहा जा सकता हा कि उसके आधार पर तय होगा कि कौन जागृति है और कौन संयमी और कौन मुनि? जो कुछ भी परिवर्तनशील है, उसको मन जानिये। जो कुछ भी कल्पना की सीमाओं के भीतर आता है, जो कुछ भी शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त हो सकता है, उसे मन जानिये और जो कुछ उसके पीछे है, जिसके विषय में आप कुछ कह नहीं सकते उसको बस एक नाम दे दीजिए; अनिवार्यता है। काम चलाने के लिए कुछ कहना तो पड़ेगा, तो हम उसे आत्मा कह देते हैं।

तो जैसा कि शरू में कहा था कि जब कृष्ण कुछ कह रहें हों, तो सारे शब्दों को बस दो में बाँट दीजिए कि किस-किस को वो भ्रम कह रहे हैं, और किसको वो आत्मा कह रहे हैं। समस्त भाग्वद्गीता में वास्तव में सिर्फ़ दो शब्द हैं, तीसरा कोई शब्द नहीं हैं और जो अभी तीसरा शब्द पढ़ पा रहा हो गीता में, उसने गीता जानी नहीं। मैंने कहा था अनेक शब्द, दो शब्द और निशब्द, शून्यता। जो अज्ञानी है, जो अहंकार की आँखों से गीता को पढ़ता है, जो कृष्ण को अपने ही जैसे समझता है, जो कृष्ण को संसार के तल पर उतर के देखता है, वो कहेगा कि बड़ी बातें करते हैं, खूब कहानियाँ सुनाते हैं, दुनिया भर की तमाम विविध वस्तुओं का नाम लेते हैं। जो ज्ञानी है वो कहेगा न, पूरी गीता में कृष्ण बस दो की बात करते हैं एक वो जो है, और दूसरा वो जो नहीं है पर होता सा प्रतीत होता है और जो कृष्ण सामान ही हो गया, वो कहेगा कि दो की भी बात मिथ्या है, वास्तव में गीता बस मौन का संगीत है, मौन का गीत है, इसीलिए गीता है। उसे फिर दो शब्द भी न सुनाई पड़ेंगे उसके लिए गीता एक निशब्द गीत है।

संतों के अवतारों के वचनों को बड़े समर्पण, बड़ी सतर्कता और बड़े ध्यान के साथ पढ़ें। एक नया ही कान चाहिए उन्हें सुनने के लिए, जब आपको लग भी रहा हो कि इन्होनें जो बात कही वो ठीक है, तो और सतर्क हो जाइए। चूँकी सम्भावना कम ही है कि सत्य आपको ठीक लगेगा। कृष्ण की बात अगर आपको प्रथमतया ही आपको जंच जाए और रुच जाए, तो संभावना यही है कि आप समझें ही नहीं हैं कि कृष्ण क्या कह रहे हैं, और कृष्ण के वचन का आपने अपनी सुविधा अनुसार, अपने अनुकूल कोई अर्थ कर लिया है और विधि यही है कि जो कुछ कहा गया हो, उसे बस दो हिस्सों में बाट लें क्यूँकी दो शब्दों के अलावा कृष्ण कोई तीसरा शब्द बोलते नहीं और अंततः वो ये चाहते हैं कि आप इन दो शब्दों के भी पार निकल जाएँ और गहरे मौन में प्रवेश कर जाएँ। वही मौन सत्य है। बताइए। क्या बात बिलकुल स्पष्ट हो गई है?

श्रोता १: सर, आपने बोला अनेक शब्द, दो शब्द, निशब्द और शून्यता तो ये निशब्द और शून्यता?

वक्ता: मैंने कहा तीन ही हैं, निशब्द और शून्यता एक ही हैं।

श्रोता २: सर, पहले जैसे अनेक शब्द ही समझ में आएगा। अनेक शब्द से दो शब्द तक कैसे जाया जा सकता है?

वक्ता: वो अनेक शब्द जब सामने आएँ, तो उनको इशारे की तरह लीजिये उन पर रुक मत जाइए। जब आप इस निष्कर्ष पर आ जाते हैं कि जो शब्द हैं, वो अपनेआप में ही एक अंत हैं, आखिरी बात है तो आप आगे भी शोधन, जिज्ञासा करते नहीं। पर यदि आप सतर्क हैं कि वचन कृष्ण का है, तो ज़रूर बात आत्यंतिक होगी। बात वहाँ पर नहीं रुक सकती, जहाँ रुकती प्रतीत हो रही है। तो फिर आपके पूर्वाग्रह आपको रोक नहीं पाएँगे। देखिये, समझिये। बात तो उसी भाषा में की गई है न, जो भाषा आम जन मानस की है। तो उसमें शब्द भी वही सारे होंगे, जो भाषा में प्रचलित हैं। वो तो कहने की, संवाद की, अनिवार्यता है उन्हें कहना पड़ेगा, पर सारे शब्द संसार की वस्तुओं और मन के विचार की ही ओर तो इशारा करते हैं। इनसे कृष्ण को क्या लेना-देना? ये तो अपनी समझ की और बुद्धि की बात है।

कहीं-कहीं पर वो खुद ही खूब स्पष्ट कर देते हैं कि अर्जुन इन घोड़ों को तू इन्द्रियाँ मान तो आपके लिए काम आसान हो गया कि ठीक बात घोड़ों की नहीं हो रही है, बात आँख की, कान की, नाक की, जिह्वा की हो रही है। उन्होनें बता दिया पर कहीं-कहीं, वो इतना साफ़ बताएँगे नहीं, कहीं-कहीं बस बोल जाएँगे। तो जब बोल गए हों, उसके पीछे जाना सीखिए नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। कृष्ण के ही शब्द नहीं तमाम आध्यात्मिक ग्रंथों को, धार्मिक ग्रंथों को इसी कारण हम समझ नहीं पाए क्यूँकी हमने उनके शब्दों को डिकोड (व्याख्या) नहीं किया है। खोल कर के नहीं देखा है कि ये क्या कह रहा है।

हमारा मन लगातार व्यक्तियों से और वस्तुओं से घिरा रहता है, तो हमें लगता है कि जो बात की जा रही होगी वो व्यक्तियों की और वस्तुओं की ही की जा रही होगी। कोई धर्म शास्त्र कहता है कि यदि कोई पाप कर रहा हो, तो उसे मारने का हक़ तुझे है। इसे पढ़ने वाला कौन? इसे पढ़ने वाला वो, जिसके मन में लगातार व्यक्तियों के ही ख्याल घूमते रहते हैं तो यदि ये वचन उसके सामने आएगा कि ‘यदि कोई पाप कर रहा हो, तो उसे मारने का हक़ तुझे है,’ वो सोचेगा कि ज़रूर यही कहा जा रहा होगा कि यदि कोई व्यक्ति पाप कर रहा हो, तो उस व्यक्ति को मारने का हक़ तुझे है। जब भी कोई संत, अवतार, पैगम्बर बात करता है, तो वो व्यक्तियों की करता ही नहीं। मैं फिर कह रहा हूँ, क्यूँकी, व्यक्तियों से उसे कोई प्रयोजन ही नहीं।

एक मात्र पाप है: मन का आत्मा से छिटकना, मन का आत्मा से बैर, मन का अपने आपको ही केंद्र मान लेना – यही पाप है।

तो यदि कोई धर्म ग्रंथ कहता हो कि पापी को मार, तो उसका एक मात्र अर्थ है कि मन को सुधार, उसका ये नहीं अर्थ है कि तलवार ले कर के चला जा और किसी की गर्दन काट दे। पर चूँकी हमारे पास वो चाभी नहीं है जिससे ये ताले खोले जा सकें, तो हम बस अपनी धारणाओं के अनुकूल कुछ अर्थ करते रहते हैं और फिर उसका नतीजा बड़ा विभत्स होता है। उसका नतीजा ये होता है फिर, कि धर्म के नाम पर गहरे अधार्मिक काम होते हैं। बताइए।


सत्र देखें : आचार्य प्रशांत, श्री कृष्ण पर: जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय


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