वो राह ताकता बच्चा

सारे जो खंड हैं मन के, वो उठते-बैठते रहते हैं, वो केवल वस्तुओं से आसक्त हैं, और वस्तुएं बदलती रहती हैं समय के साथ, स्थान के साथ, पर मन का ‘वो’ एक बिंदु अचल है। उसको तो एक ही दिशा जाना है और वो एकटक देखे जा रहा है।

मन का बाकी माहौल कितना बदलता रहे, वो एक है अकेला, जो उधर को ही देख रहा है। जैसे कि एक कमरे में बहुत सारे बच्चे मौजूद हों, और उस कमरे में खेलने के हज़ार खिलौने रखें हैं, और मिठाइयाँ रखी हैं, और मनोरंजन के उपकरण रखे हैं, और बहुत सारे बच्चे हैं, जो उनमें मगन हो गए हैं। कोई बच्चा, कोई खिलौना उठा रहा है और हज़ार खिलौने, और हज़ार मिठाइयाँ रखी हैं।

पर एक बच्चा है, जो लगातार खिड़की से बाहर को देख रहा है कि माँ कहाँ है। उसे कमरे के भीतर का कुछ चाहिये ही नहीं। और बच्चों के हाथ के खिलौने, और मिठाइयाँ और डब्बे बदल रहे हैं, वो एक दिशा से दूसरी दिशा भाग रहे हैं, कभी ये उठाते हैं, कभी वो उठाते हैं, पर ये बच्चा एकटक बस खिड़की से बाहर देख रहा है- ‘माँ के पास जाना है’। नानक कह रहे हैं, तुम इस बच्चे के साथ हो लो।


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