दुःख की समझ ही दुःख से मुक्ति है

दुःख समझा जा सकता है कि जब दुःख है, तो जान लिया कि ये क्या है। और जानने से ये नहीं होता है कि दुःख गायब हो जाता है। जानने से बस इतना होता है कि आप सिर्फ़ उस दुःख के आयाम में ही नहीं रहते। दुःख और सुख के ही आयाम में नहीं रहते। आप किसी ऐसे आयाम में भी स्थित हो जाते हो, जहाँ पर दुःख और सुख दोनों ही नहीं है।

“मैं दुखी हूँ और दुःख का मुझे बोध है।” उसका अर्थ ये नहीं है कि दुःख कम हो जाएगा। दुःख रहेगा। जगत का स्वभाव है दुःख, और जिस हद तक आप जगत हो, आप दुखी भी रहोगे। पर साथ ही साथ आप किसी ऐसे में भी स्थित हो जाओगे, जहाँ पर दुःख और सुख दोनों अनावश्यक हैं। एक ऐसा बिंदु, जिसको दुःख नहीं छू सकता, सुख नहीं छू सकता। दुःख कम नहीं हो गया। कोई इस लालच में न रहे कि ये सब करके दुःख कम हो जाते हैं। दुःख रहेंगे।


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