ध्यान क्या है?

ध्यान का मतलब हुआ निरंतर तुम्हारे मन में अपने से किसी के ऊपर होने का भाव मौजूद रहे। मन कभी इतना दुराग्रही ना हो जाए कि अपने आप को सेवक से ऊपर कुछ और समझ ले। मन हमेशा किसी एक के सामने झुका हुआ रहे। और वो जो कोई एक है वो मन की कोई कल्पित वस्तु, विचार नहीं हो सकता । क्योंकि अगर मन अपनी ही किसी कल्पित इकाई के सामने झुका, तो फिर अपने ही सामने झुका यानि कि झुका ही नहीं। तो मन को यदि झुकना है तो मन को किसी बाहर वाले के सामने झुकना पड़ेगा- इस का नाम ध्यान है।


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