जवानी ही प्यार और विद्रोह कर सकती है।

जीवन में कभी ऐसा भी मौका आता है जब आदमी ये नहीं सोचता कि आगे क्या होगा । जो लोग समझौते कर लेते हैं, उनके पास यही तो बहाने होते हैं ना, कि देखो हमने भविष्य का ख़याल करा, इत्यादि, वो बड़े समझदार लोग होते हैं। फिर एक मौका आता है जब आप समझदारी छोड़ देते हो, आप कहते हो मैं सोचना ही नहीं चाहता कि नतीजा क्या निकलेगा, मुझे बर्दाश्त नहीं करना तो नहीं करना। प्यार और विद्रोह दोनों बातें जवानी से सम्बंधित हैं, जवानी ही प्यार और विद्रोह कर सकती है। न प्यार ज़बरदस्ती कराया जा सकता है, न विद्रोह। तुम्हारे साथ बड़े ज़ुल्म हो रहे हों, तुम पीते रहोगे, तुम झेलते रहोगे। कोई होता है, जो नहीं पीता, नहीं झेलता वो खड़ा हो जाता है। उसमें और तुम में क्या फर्क है, अब क्या बताएं। तुम ही हो सकता है, एक दिन कह दो कि अब और नहीं बर्दाश्त करना। उस दिन क्या ख़ास हो जाएगा मैं कैसे बताऊँ? जब मैं ये कह रहा हूँ कि कुछ गलत है, तो ये मतलब नहीं कि दुनिया में कुछ गलत है। तुम्हारे अपने भीतर जो गलत है, तुम्हें उसके खिलाफ भी तो खड़ा होना होता है ना। तुम अपनी ही कितनी नाकामियों को, मक्कारियों को, झेले जाते हो, पनाह दिए जाते हो। कितने ही लोग हैं जो इस तरह की बातें करते हैं, कि मुझे पता है कि मैं गलत हूँ, लेकिन मैं क्या करूँ? एक दिन आता है जब तुम कहते हो, कि मुझे अगर पता है कि मैं गलत काम कर रहा हूँ, तो नहीं करूँगा। नासमझी में कर लिया तो कर लिया, पर अब अगर पता है कि कुछ गलत है तो नहीं करूँगा। वो दिन कब आएगा हम नहीं बता सकते।अपने ही नकली चेहरे के प्रति विद्रोह कर पाना, ज़रूरी तो बहुत होता है, पर ज़बरदस्ती नहीं हो सकता।


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