प्रेम क्या?

प्रेम में जो गति होती है उसमें एक सुव्यवस्था होती है। प्रेम में जो गति होती है वो न तो शराबी की होती है, न वो धावक की होती है। प्रेम की गति वैसी होती है जैसे नर्तक की होती है। प्रेम एक माहौल है जिसमें सब कुछ हो रहा है। खा रहे हैं, उठ रहे हैं, पी रहे हैं सब प्रेम में हो रहा है। कि जैसे बाहर मौसम अच्छा है, तो जो भी करो अच्छे मौसम में हो रहा है। तो प्रेम एक मौसम की तरह है।


पूरा पढ़े: शून्य में नग्न रह जितने लिबास ओढ़ने हों,ओढ़ो (Staying innocent,play with the masks)

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