ना वो बढ़ता है, ना वो घटता है

 

वक्ता: चलो, इसका मतलब बताओ, “बड़ा न होवै घटि न जाइ”।

श्रोता: जो है ही नहीं, उसे मन के दायरे कि दुनिया में ला ही नहीं सकते।

वक्ता: बस, यही बोल दो, “मन जो कुछ कर सकता है, उसके दोनों सिरों को बस नकारना है”।

मन क्या-क्या कर सकता है? बड़ा कर सकता है, छोटा कर सकता है। जोड़ सकता है, तोड़ सकता है।

तो जितने यह छंद होंगे ऐसे बोलेंगे, “ना तोड़ा जा सकता है, ना जोड़ा जा सकता है। ना बढ़ाया जा सकता है, ना घटाया जा सकता है, ना काला है, ना सफ़ेद है। ना जल में है, ना थल में है। ना इस लोक में है, ना उस लोक में है”। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है कि, ‘मन में नहीं है’। बस इतना सा ही अर्थ है। और चूँकि मन में नहीं है, और मन में जो होती है, उन्हीं का नाम वस्तु हैं। इसीलिए वस्तु नहीं हो सकता। जो कुछ मन में आ गया, वो क्या बन गया?

श्रोता: वस्तु।

वक्ता: वस्तु बन गया। तो यह बड़ा अच्छा और बड़ा सामान्य तरीका रहा है। बड़ा प्रचलित तरीका। तमाम ग्रंथों में कि, इसी तरीके से बोलो। की ‘वह’ क्या है? ना काला, ना गोरा। कभी काला, कभी गोरा। कभी यह रंग देखा है? बाहर-बाहर काला, अन्दर-अन्दर गोरा। बाहर-बाहर गोरा, अन्दर-अन्दर काला। बहुत ही छोटा, बहुत ही बड़ा। इतना तरल कि कहीं भी घुस जाये, इतना ठोस कि काटा न जाये।

वक्ता: ‘कुछ’ भी नहीं। ‘सब कुछ’ भी। और ना ‘कुछ’, ना ‘सब कुछ’। यहाँ कुछ नहीं किया जा रहा। यहाँ हर प्रकार के द्वैत के दोनों सिरों को काटा जा रहा है। ताकि तुम्हारा मन छवि न बना सके। नेति-नेति मन का उपचार है। द्वैत के एक सिरे से आसक्ति, मन की व्याधि है। नेति-नेति उसका उपचार कर देती है।

मन की व्याधि ही यही है कि उसको कुछ अच्छा और कुछ बुरा लगता है। मन की हर बिमारी का तत्व यही होता है कि ‘मन को कुछ अच्छा, कुछ बुरा लगा’। जब बुरा लगा, तब मन ने कहा “हम ठीक नहीं है। हम बीमार हैं”। द्वैत के एक सिरे से मन आसक्त हुआ। नेति-नेति दोनों सिरों को काट देती है। न इधर जाओ, न उधर जाओ। जिधर जाओगे, उधर ही बीमार हो जाओगे। बीमारी कुछ ऐसी है कि, काले वाले सिरे पर बैठे, तो भी बीमार; और यदि गोरे वाले पर भी बैठे, तो भी बीमार। और जो पागल होते हैं, वो सोचते हैं कि काले सिरे पर बैठने का उपचार है ‘गोरा सिरा’। वो समझते ही नहीं हैं कि इस सिरे से उस सिरे तक जाओगे तो बीमारी बदल नहीं जाएगी।

श्रोत्ता: जब भी कुछ अच्छा बुरा होता है, तब नेति-नेति करते रहो?

वक्ता: हाँ, बिलकुल।

बोध में न कुछ अच्छा होता है, न बुरा होता है। ‘आनंद’, अच्छा लगने की अवस्था नहीं होती। इसीलिए इतनी बार कहता हूँ कि ‘आनंद मज़ा नहीं है। ‘आनंद’ अच्छा नहीं लगेगा। ‘आनंद’, ध्यान से अगर देखो, तो बस अनुपस्थिति है, अच्छे लगने की भी और बुरे लगने की भी। और चूँकि वही शुन्यता, वही खालीपन तुम्हारा स्वभाव है, इसीलिए मन, ‘आनंद’ की अवस्था में पीड़ा नहीं अनुभव करता। 

बस इतना होता है। हमारी बाकी सारी अवस्थाएं, पीड़ा की अवस्थाएं हैं। सुख की पीढ़ा है, नहीं तो दुःख की पीढ़ा है। ध्यान देना। दुःख की पीढ़ा है, नहीं तो सुख की पीढ़ा है। पर हमारा जीवन लगातार मात्र पीढ़ा है।

‘आनंद’ वो अवस्था है, जिसमें न सुख की पीढ़ा है, न दुःख की पीढ़ा है। ‘आनंद’ मात्र मुक्ति है, हर प्रकार की पीड़ा से। सुख की पीढ़ा से भी और दुःख की पीड़ा से भी।

तो ‘आनंद’ को कोई सुख न समझ ले। जैसे बोध ज्ञान नहीं, ठीक उसी तरह से ‘आनंद’ सुख नहीं।

श्रोता १: सर, आपने अभी-अभी बोला कि ‘खालीपन तुम्हारा स्वभाव है’। सर, मेरे साथ दो-ढाई हफ्ते होने वाले हैं कि जब भी कोई दूसरी चीज़, दिमाग को कब्ज़ा करती है, तो दूसरा विचार ही यह होता है कि, यह काम का नहीं है। और छोटे तलाशने से कुछ नहीं होगा। और उसके बाद क्या होता है कि एक खालीपन आता है। शुरुवात में तो खालीपन आता नहीं। आप भर देते हो। आप खुद भर देते हो। तो पिछले दो हफ़्तों से मैं खालीपन के साथ रह रहा हूँ। पर अब वो खालीपन, अजीब सा लगता है। कि मतलब ऐसा लगता है कि वो है और वो आरामदायक नहीं है। आराम महसूस नहीं होता उसमें।

वक्ता: समाधि, बस उससे एक हो जाने का नाम है।

अपने अंदरूनी शून्य के साथ, एक हो जाने का नाम ही तो समाधि है। मैं अपने अकेलेपन के साथ भी आराम में हूँ। यही समाधि है।

श्रोता १: तो वो धीरे-धीरे।

वक्ता: (बीच में ही) बस, बस, बस। न लड़ो, न भागो।

श्रोता २: जो ऊब होती है। उसमें भी एक तरह का खालीपन है, हलाकि वो भी नापसंद होती है।

वक्ता: ऊब में खालीपन नहीं है। ऊब में तलाश है। ऊब में तो आकांक्षा है, ‘भरे जाने की’। यह उस अवस्था की बात कर रहा है कि यह तो नहीं है की भर दो। पर जो खाली जगह है, वो अपरिचित सी लग रही है।

श्रोता ३: बिलकुल सर, मैं भी ऐसा महसूस कर रहा था।

वक्ता: वो तो देखो, मन समय में जीता है। मन को तो समाधि से भी परिचित होने में समय लगेगा। तुम्हारी हालत अभी यह है कि तुम जिसके करीब पहुँच रहे हो, जो तुम्हारा स्वाभाव है, तुम्हें वही बेगाना सा लग रहा है।

श्रोता १: तो फिर जैसा आप बताते हैं, तब ऐसा लगता है कि भाई वो स्वाभाविक चीज़ है, तो उस में आराम का एहसास करोगे।

वक्ता: मैंने माना है कि मैं आराम मैं हु तो मुझे मानाने दो। ये चलेगा।

(सब श्रोता हंसते हैं)

तो यह सब तो बेहूदगियां हैं। यह सब कुछ नहीं है।

श्रोता २: और ऐसा भी तो हो सकता है कि मान लीजिये की अकेलापन है, और उसके साथ अभी हम सहज नहीं हो पा रहे। और आप बोलते हो कि घबराओ मत मुझे अभी इस बात पे इतना विश्वास नहीं होता।

वक्ता: सिर्फ़ एक कदम पर वो आख़िरी कदम नहीं होगा अगर वो अंदर से नहीं आया तो। हमने आज सुबह ही बात करी थी कि, जीवन का रस बाहर के खाने से नहीं आता। आत्मा से उठता है। तो ठीक है। वो तुम्हारी आत्मा से ही उठेगा। तुम्हें दिखाई देगा कि उसमें है कीमत। खुद ही दिखाई देगा। फिर तुम खुद ही कहोगे कि “बाकी बातें तुम मुझे कुछ भी बता दो, पर मुझे पता चल गया है कि कीमती चीज़ क्या है। मुझसे इधर-उधर की फ़ालतू बातें, करो ही मत। मुझे पता चल गया है, और अब कोई हिला नहीं सकता”।

श्रोता ४: सर, मन कम्फर्ट वैसे भी होता है, जैसे आप कह रहे हैं ‘जाग के हम सोये हुए हैं’। उसमें ‘जाग हुई’ होती है। फिर वो भी बड़ा असुविधाजनक एहसास देता है। कुछ समय लगता है आराम मिलने में।

वक्ता: पर वो जो असुविधा है, वो असुविधा इसलिए होती है क्योंकि मन का ही एक हिस्सा दूसरे से लड़ रहा होता है, वो इसीलिए है। यह एक ख़ास तरह की असुविधा है। जहाँ पर मन अपने विघटन से ख़ुश नहीं है।

मन ऐसा है। “अच्छा चला जाऊं? कुछ नहीं होगा? कोई दिक्कत नहीं होगी? मैं चला जाऊं? मेरे जाने पर भी सब ठीक रहेगा? मैं कोई चिंता न करूँ? तब भी काम चलता रहेगा?” यह वो वाला है। उसको डर लग रहा है। अच्छा? “मतलब मेरे ना होने पर भी काम चल जाएगा। हाँ, मतलब मेरे न होने पर भी, सही हैं ना? यह संभव कैसे है?”

श्रोता १: फ़िक्र मत करो, स्वाभाविक है।

श्रोता ५: उनको भी लगता है समय, दो चार महीने।

वक्ता: तुम लोग असल में, ऐसे महौलो में भी रह रहे हो ना, जहाँ अभ्यास भी कम मिलता है, अकेला होने का। हर समय तो कोई न कोई घुसा रहता है। तुमको खाली कमरा ही नहीं देखने को मिलता होगा।

श्रोता ३: सर, पार्क और बहुत सारी जगह हो सकती हैं, जहाँ पर खाली रह सकते हैं।

वक्ता: रह सकते हैं, पर क्या रहते हैं? रहो तो अच्छा है। जितना ज्यादा किसी की शक्ल देखोगे, उतना ज्यादा तुम्हारा मन डाउन-डाउन रहेगा। खाली कमरे में रह पाना, शांत रह पाना। बड़ी बात है। बहुत लोग हैं, जो कोई खाली कमरे में आधे घंटे नहीं रह सकते।

श्रोता १: सर, कई बार फेसबुक डिलीट करने का मन करता है। बहुत ज्यादा। हटा दो। फिलहाल के लिए तो हटा दो। वाटसएप को भी।

वक्ता: हटा देंगे, वक्त आने पर हटा देंगे। चिंता मत करो। सब हट जाएगा वक्त आने पर।

श्रोता ६: अभी तो चाहिए ना। रिमाइनडर है, इसीलिए तो रखा हुआ है। वरना फायदा क्या है, उसका?

वक्ता: (व्यंग में) कौन सा हमें ज़ुकरर्ब्र्ग को बहुत सारे पैसे देने हैं?

(सब हँसते हैं)

वक्ता: कभी न कभी हटा ही देंगे।

श्रोता ७: सर, जब हम घर में रहते हैं, या इस माहौल में रहते हैं, तब लगता है कि सब समर्पित कर दिया है। सब ठीक है। जैसे ही बाहर निकलते हैं, सारा निकल जाता है।

वक्ता: पकड़ कर रखो ना। पकड़ कर रखो।

श्रोता ७: पॉकेट तो नहीं मार लेगा ट्रेन में। तो फिर?

वक्ता: पकड़ कर रखो। और इस बात पर देखो कोई बहुत खंडन नहीं है कि आप पॉकेट  का ख्याल भी रख लो, और तब भी होशियार रहो। दिक्कत है, पॉकेट  से सनक में। पॉकेट को जितना ध्यान चाहिए, उतना दे लो। और मुक्त हो जाओ, पॉकेट से। पर आप पॉकेट  को पकडे ही खड़े हुए हो ट्रेन  में। और पुरे दो घंटे ट्रेन में पॉकेट  को पकडे ही रखा। क्या किया? पॉकेट को पकड़ कर रखा। यह कोई ऐसी समस्या नहीं है कि जो पॉकेट  की सोच रहा है, और ध्यान में नहीं हो सकता है। आप पॉकेट  की परवाह करके भी, ध्यान में हो सकते हो। क्यों नहीं हो सकते?

श्रोता ३: सर, लगता है की एक बिंदु के बाद, आपको ध्यान में रहने के बाद भी, आपका ध्यान नहीं लगेगा। क्योंकि कई बार, कितने सालों से, मैं अपनी बाइक में ही कई बार चाबी छोड़ कर चला जाता हूँ। और दो-ढाई सालों से, मेरा कोई दोस्त या कोई और ही बताता है की ‘तेरे बाइक में चाभी है’। और आज तक चोरी नहीं हुई।

(मौन)

वक्ता: ठीक, क्या हो गया? अच्छी बात है।

(व्यंग में) बस यह है कि जब जाए तब रोओ नहीं।

(सब श्रोता हंसते हैं)

वक्ता: (व्यंग में) क्योंकि देखो, जायेगी। यह तो पक्का है। कभी न कभी तो जायेगी।

(सब श्रोता हंसते हैं)

श्रोता ५: (व्यंग में) यह तो टेस्टिंग हो जायेगी कितने समय तक।

वक्ता: जब जाये तो बोलो, “ठीक गई तो गई”। क्या करना है अब?

श्रोता २: (व्यंग करते हुए) मैं एक बार बाइक से स्कूल गया और बस से वापस आया।

(सब श्रोता हंसते हैं)

वक्ता: ऐसा होता तो सबके साथ ही हुआ है।

श्रोता १: (व्यंग करते हुए) चाभी निकाल लेगा, चोर।

(सब श्रोता हंसते हैं)

श्रोता २: (व्यंग करते हुए) आपका पता क्या है?

(सब श्रोता हंसते हैं)

श्रोता ८: सर, मुझे एक चीज़ पूछनी है। जैसे आप जैसा सब बोल देते हो। उसके ऊपर कोई सवाल-जवाब नहीं है। लेकिन यह भी नहीं है की।

वक्ता: (बीच में ही) बेटा, उसमें देखो। मन तो कॉजइफ़ेक्ट पर ही चलता है।

(मौन)

वक्ता: एक कमरे में एक ए.सी लगना होता है। अब तो कुछ नहीं करते थे। तो पहले जब वो ए.सी लगना होता था, तो पहले वो वाले दरवाज़े लगाये जाते थे, जो बंद हो जाता है अपने आप। क्या कहते हैं उसे? डोर क्लोसर। यह होता था, ताकि ठंडक बाहर न निकल सके।

जिन लोगों की गाडी आनी होती थी पहले वो लोग उसका गेराज तैयार कराते थे। अब नहीं होता। पहले गाडी के लिए गेराज तैयार होता था। मतलब समझ रहे हो?

श्रोता १: महत्त्व।

वक्ता: घर में गाडी तो आ गयी। तुम्हारा गेराज तो तैयार ही नहीं है। तुम चाहते ही नहीं। क्यों तैयार नहीं है? क्योंकि गाडी करीब-करीब मुफ्त में आई है। गाडी करीब-करीब मुफ्त में ही आई है। तो तुमने क्या किया? गाडी तुमने कही भी इधर-उधर लगा दिया। अब जब गाडी आती है, तो चोरी हो जाती है। चार-पांच बार मुफ़्त की गाडी हमें मिल चुकी है। और हर बार जब हमें मिलती  है तो दो-चार दिन में चोरी हो जाती है। अरे गाडी मिली रही है, मुफ़्त में । पर गेराज तो तुम्हें अपना ही बनाना पड़ेगा। समझ रहे हो क्या बोल रहां हूँ? बात समझ में आ रही है?

ए.सी मुफ़्त में मिल रहा है। पर तुम्हारे कमरे की खिड़कियाँ खुली हैं। दरवाज़े खुले हैं। फिर तुम कहते हो की ठंडा क्यों नहीं रह पाता? चलो ए.सी अनुकम्पा है। वह मुफ़्त में मिल रहा है। पर अपना कमरा भी तो ठीक रखो।

श्रोता ८: सर, जैसे हमें कई बार सवाल-जवाब का कुछ अर्थ समझ में नहीं आता है।

वक्ता: अपनी मेहनत भी करो साथ में। तुम्हारी मेहनत, तुम्हारा ध्यान है। दोनो पक्षों को एक साथ, एक बराबर की मेहनत करनी होती है। बोलने वाले को यह ध्यान रखना है कि साफ़ से साफ़ बात बोली जाये। सुनने वाले को भी उतनी मेहनत से, यह ध्यान रखना है कि साफ़ बात अगर आ रही है, तो उसे साफ़ ही सुनु भी। दोनों ही पक्षों में से कोई एक भी यदि फिसलेगा, तो घटना नहीं घटेगी । उतनी ही मेहनत करो ना।


सत्र देखें: Acharya Prashant on Nanak: ना वो बढ़ता है, ना वो घटता है (Neither it increases nor it decreases)

इस विषय पर और लेख पढ़ें:

लेख १: आप ही मूल आप ही शूल आप ही फूल 

लेख २: आचार्य प्रशांत: कर्मफल मिलता नहीं, ग्रहण किया जाता है

लेख ३:  कर्मफल से बचने का उपाय 


सम्पादकीय टिप्पणी :

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