क्यों ज़रुरी है कि संसार का काम चलता रहे?

श्रोता: रमण जी कहते हैं कि ” तत्क्षण ही तुम आतंरिक सुख को पा सकते हो”। सर, फिर ये सवाल मन में आता है कि कोई काम क्यों करेगा फिर, कोई भी काम? आपने अभी कहा था इसमें कि इंजन  डर और इंजन  लालच के अलावा एक और भी इंजन  है जिसे आप कुछ भी नाम दे सकते हो, गॉड(ईश्वर) दे दो, जीज़स दे दो, कृष्ण दे दो। तो सर, यह इंजन  अभी तक समझ नहीं आया है कि क्या है वो इंजन?

वक्ता: तो ये तो तुमने पक्का कर रखा है कि काम तो होना ही है। काम लालच से और भय से न हो तो काम किसी और स्रोत से हो, उसको ऊर्जा किसी और इंजन से मिले पर काम तो होना ही चाहिये। तो सबसे ऊपर तुमने किसको रखा है?

श्रोता: काम।

वक्ता: तो मिल गया तुम्हें परमात्मा। ‘काम’ है तुम्हारा परमात्मा। अब यह बताओ कि तुम काम क्या करते हो? क्या काम करते हो?

श्रोता: पढ़ाई-लिखाई।

वक्ता: क्यों करते हो?

श्रोता: ताकि ज्ञान हो जाये।

वक्ता: और क्यों करते हो?

श्रोता: ताकि ज्ञान मिल जाये बस।

वक्ता: तो तुमने काम को बनाया परमात्मा और काम को करने वाला कौन? काम तैय करने वाला कौन? तो वास्तव में तुमने किसको खुदा बनाया?

श्रोता: अपने आपको।

वक्ता: इतनी सी बात दिखती नहीं है। मतलब यह तो पक्का ही है कि दुनिया जैसी चल रही है वैसी ही चलनी चाहिये। काम-धंधे रुकने नहीं चाहिये। सर, आपकी इतनी बात हमें समझ में आई कि हम जो काम-धंधे करते हैं वो भय और लोभ से करते हैं तो ये बता दीजिये कि भय, लोभ के अलावा और कौनसी तीसरी चीज़ से कर सकते है? पर होने तो चाहिये, यह तो प्रश्न ही नहीं उठता कि क्या ज़रूरी है कि यह काम-धंधे होते ही रहें? वो तो प्रश्न ही नहीं है, वो तो होने हैं क्योंकि किसके काम धंधे हैं वो?

श्रोता: मेरे।

वक्ता: मेरे और मैं कौन हूँ? मैं तो वो हूँ। सबसे ऊपर तो मैं ही हूँ न, दिखता नहीं है कि सबसे ऊपर तुम अपने छुद्र स्वार्थ और अहंकार को रखते हो। अगर सत्य को सबसे ऊपर रखोगे तो कहोगे वो सबसे ऊपर; आगे का वो तय करेगा। काम-धंधे चलने होंगे तो चलेंगे और नहीं चलने होंगे तो ठप पड़ जाए। प्रथम वरियता तो उसको है ना। आगे की वो जाने और हमें क्या पता कि हमारे लिये कौन सा काम उचित है। जो सत्य में नहीं है जो झूठ में है वो काम भी कैसे कर रहा होगा? तो अभी तो मैं यह भी नहीं जानता कि काम कौनसा ठीक। सत्य में आने के बाद ही तो पता चलेगा कि करने लायक काम है भी कैनसा है। पर मैं कहता हूँ नहीं। काम तो देखिये साहब, मेरा काम है, मैंने तय किया, मेरा स्वार्थ, मेरा हित।


सत्र देखें: Acharya Prashant: क्यों ज़रुरी है कि संसार का काम चलता रहे? (Why must the world go on?)

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लेख १: आप ही मूल आप ही शूल आप ही फूल 

लेख २: आचार्य प्रशांत: कर्मफल मिलता नहीं, ग्रहण किया जाता है

लेख ३:  कर्मफल से बचने का उपाय 


सम्पादकीय टिप्पणी :

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