साधु और सांप का संघर्ष

आदमी का जीवन इन्हीं दोनों के बीच की कशमकश है।

आपके भीतर एक साधु बैठा है, आपके भीतर एक साँप बैठा है; साधु आपको एक दिशा खींचता है, साँप आपको दूसरी दिशा खींचता है और इन्हीं दोनों के मध्य आपका जीवन चलता रहता है।

कबीर कह रहें हैं: साधु को बल दो। तुम साधु के साथ खड़े हो जाओ। याद रखना! भले घर्षण इन दोनों के मध्य हो पर इनमें से जीतेगा कौन, इसके निर्धारक तुम हो। तुम साधु के साथ खड़े रहोगे, साधु को बल मिलेगा।

तुम साँप के साथ खड़े रहोगे, साँप को बल मिलेगा क्योंकि हैं तो दोनों तुम्हारे ही ना। तुम्हारे ही हैं, तो तुम्हरा होना ही तय करेगा कि दोनों में से जीतता कौन है। दोनों तुमसे बाहर के तो नहीं है, तुम्हारे ही है। तुम्हीं तय करोगे कि दोनों में जीतता कौन है।


पूरा लेख पढ़ें:  तुम ही साधु, तुम ही शैतान