वह निःसंग है; मात्र वह ही है

वक्ता: नो पार्टनर हैज़ गॉड, दिस आई ऍम इन्स्ट्रक्टेड, एंड आई ऍम दी फर्स्ट ऑफ़ दोज़ हू सबमिट।

वो असंग है। वो असंग है।

कैवल्य का यही अर्थ होता है कि मात्र वो है, केवल वो है, उसके अलावा और कोई है ही नहीं। तो उसका कोई संगी है, ये प्रश्न ही नहीं पैदा होता। संगी का अर्थ ही हुआ कि दो है, कि परम सत्ता दो हैं। ना, वो असंग है। इसी को एकांकीपन कहते हैं। “नो पार्टनर हैज़ गॉड”, इसी बात को कहा जाता है ‘एकांकीपन’। ही अलोन एक्सिस्ट्स । 

वो असंग है। उसी बात को कैवल्य भी कहते हैं कि उसके अलावा और कोई है ही नहीं; केवल वही है; मात्र वही है। इसमें दो बातें गौर की हैं: एक तो यही कि “नो पार्टनर हैज़ गॉड, दूसरी एक और बात है जो पीछे रह जाती है जो थोड़ी सी छुपी हुई है, आई ऍम दी फर्स्ट ऑफ़ दोज़ हू सबमिट।

इस्लाम में, विनम्रता पर, विनय पर बड़ा ज़ोर है। अब तक हमने एक मूलभूत फ़र्क देख ही लिया होगा, भारत में, वेदांत में, अक्सर ये कह दिया जाता है कि “मैं ही वो हूँ, अहम् ब्रह्मास्मि, तत् त्वम् असि”; कुरान स्पष्टतया कभी भी ये नहीं कहती। कभी भी नहीं कहती। हलाकि सूफियों ने फिर बाद में बिलकुल यही कहा है, लेकिन तुम अगर गौर से ढूँढोगे भी, तो भी कुरान में ये वाक्य कहीं पढ़ने को नहीं मिलेगा कि तुम और अल्लाह एक हैं। ये तो सुनने को मिलेगा कि उसके पास आओ, कि उसके दास हो जाओ, उसके प्रेम में पड़ो, निकटता खूब रहे, खूब रहे, खूब रहे, लेकिन फिर भी, आखिरी बात कुरान कभी नहीं कहती। क्या? कि “तुम्हारा मिलन ही हो गया, योग ही हो गया”, ना ये ना कहती कभी भी कि तुम एक ही हो गए।

ये भी कहती है कि सब उसी से आते हैं और उसी में जाते हैं, यहाँ तक कह देती है; लेकिन तुम्हारे मन को, वो अहंकार का ये मौका नहीं देती है कि तुमसे कहे कि “तुम वही हो जाओगे”। उस बात को अनकहा छोड़ दिया गया है। आखिरी बिंदु तक तो वो आपको ले आई है, कुरान आपको आखिरी बिंदु तक ले आती है, कि प्रभु से नजदीकी बढाओ, उसके निकट आओ, लेकिन कभी भी ये नहीं कहती कि “तुम इतने निकट आ सकते हो कि वही हो जाओगे”।

सच तो ये है कि अगर कोई दावा करे कि मैं वही हो गया हूँ तो इसको कुफ्र माना जाता है। तो वो इस दावे को भी स्वीकार नहीं करती है कि कोई खड़ा होकर कह दे कि मैं अल्लाह हो गया। मंसूर को इसी कारण फांसी हुई थी, उसने ठीक यही कह दिया था कि “सत्य मैं ही हूँ, अनलहक”। वजह उसकी यही है। वजह, मनोविज्ञान है, वजह आध्यात्म नहीं है। जो कुरानकार है, उसने आदमी के मन को खूब समझा है। उसने ये अच्छे से जान लिया है कि हम ऐसे हैं, कि अगर हमको जरा सी छूट मिले, मन को जरा सी ढील मिले, तो वो मक्कारी कर ही डालता है। “माया तो ठगिनी बड़ी”, माया घुस आएगी। तुमने अगर इस बात के लिये जगह छोड़ी कि इंसान भगवान हो सकता है, तो पक्का समझो कि हर इंसान अपने आप को?

श्रोतागण: भगवान मानेगा।

वक्ता: भगवान का ही दावा करेगा। इसीलिये ये कोई ताज्जुब की बात नहीं है, कि भारत की मिथ में, कई राक्षसों ने, जिसमें सबसे उल्लेखनीय है रावण, बड़ी कशिश से ये कहा कि अहम् ब्रह्मास्मि तुरंत दुरोपयोग कर लिया इस बात का कि “मैं ही ब्रह्म हूँ”। समझ में आ रही है बात?

तो उस बात को अनकहा छोड़ना बहुत ज़रूरी है, इसलिये नहीं कि वो बात झूठी है, बात तो सीधी है, उसी से निकले हो उसी में वापस जाओगे। जब वापस जा सकते हो, तो वही हो गए न? भाई, छोटी-छोटी नदियाँ, गंदे नाले भी यही गंगा में मिल जाते हैं तो क्या हो जाते हैं?

श्रोतागण: गंगा।

वक्ता: गंगा ही हो जाते हैं न? तो जो अल्लाह में वापस जाएगा, निश्चित सी बात है, वो क्या हो जाएगा?

श्रोतागण: अल्लाह।

वक्ता: लेकिन इस बात को कभी कहा नहीं जाता। क्योंकि अगर कहा गया तो पक्का है कि तुम इस बात का, दुरूपयोग करोगे ही करोगे। इसीलिये ठीक ही किया गया, कि इस घोषणा को वर्जित कर दिया गया। देखो, बुद्ध से जब पूछा गया कि ‘सत्य क्या है?’ तो बुद्ध ने कहा कि “सत्य वो, जो काम आए”। बड़ी अजीब परिभाषा है, जो तुम्हारे काम ना आ सके, वो सत्य नहीं है। तो ऐसे सत्य उच्चारित करने से कोई लाभ नहीं, जो तुम्हें नुकसान पहुंचा दें। ऐसी बातें बोलनी ही नहीं चाहिए, जो हो सकता है कि सच हों, लेकिन सुनने वाले को?

श्रोता: नुकसान पहुचाएं।

वक्ता: इसीलिये कुरान ने कभी नहीं कहा है कि “अहम् ब्रह्मास्मि”। नुकसान हो जाएगा। वैदिक धर्म ने कह दिया, वहाँ तो, वैदिक धर्म ने तो ये भी कहा कि “तुम अपने गुरु आप हो सकते हो”। तात्विक दृष्टि से बात बिलकुल ठीक है, तुम अपने गुरु आप हो सकते हो, लेकिन जो भी इस बात को सुनेगा, उसका नुकसान हो जाएगा। क्योंकि ये बात जैसे ही अहंकार के कान में पड़ेगी, वो क्या करेगा?

श्रोतागण: खुद अपने आप को गुरु मान लेगा।

वक्ता: ‘जरुरत क्या है! जरुरत क्या है?’ और बात हमेशा पड़ती किसके कान में है?

श्रोतागण: अहंकार के कान में।

वक्ता: अहंकार के ही कान में पड़ती है। बात बिलकुल सच है, “अयम् आत्मा ब्रह्म”। जो आत्म है वही ब्रह्म है। बात बिलकुल सच है, कि परम गुरु तुम्हारे भीतर ही बैठा है। तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो तुममें और परम में कोई अंतर ही नहीं है; तुम वही हो। लेकिन उस बात को नहीं कहना चाहिये। ठीक ही है कि नहीं कहना चाहिये। तुम भी कभी मत कहना। हम यहाँ गुरुगण बैठे हुए हैं, हमें इस बात को समझना होगा, कि भले ही कोई बात मूलतः सत्य की ही उद्घोषणा हो, लेकिन सतर्क रहें बोलते समय कि किससे कह रहे हैं। जब तक अहंकार है, तब तक ये बात सुनी तो नुकसान है, और जब अहंकार नहीं है, तो ये बात अपने आप ही जान जाओगे; तो बताने से क्या फायदा? दोनों ही स्थितियों में बताना, लाभप्रद नहीं है। यदि अहंकार अभी जोर मार रहा है और ये बात बता दी, तो ये बात क्या करेगी?

श्रोता: और पक्का करेगी।

वक्ता: नुकसान करेगी। और यदि अहंकार लय हो गया है, समर्पित हो गया है, तब तो वैसे भी तुम इस बात को जान ही जाओगे। तो बताने की कोई आवश्यकता नहीं। समझ रहे हैं?

श्रोता: हूँ।

वक्ता: तो इस्लाम आपको इतना ही कहता है कि दास बने रहो। वो बराबरी का दावा कभी करता ही नहीं। वो आपको ये छूट नहीं देता है, कि तुम खुदाई के साथ कंधे से कन्धा मिला कर खड़े हो सकते हो। ना, तुम्हारी जगह, चरणों में है। प्रभु के चरणों में समर्पित रहो, इससे ऊपर जाने कि चेष्टा नहीं। लेकिन जो समर्पित हो जाएगा, जो समर्पित हुए हैं, उन्होंने इस बात को बखूबी जाना है, गहराई से जाना है, कि जो चरणों में समर्पित हो गया, वो वही हो ही गया। लेकिन जिसने वही होने की आकांक्षा करी, वो समर्पित हो नहीं पाएगा। तो तुम तो समर्पण तक ही जाओ, आगे की मत सोचना। आगे का काम अपने आप होता है।

हम वो जेन  पंक्तियाँ पढ़ रहे थें, जिसमें एक जेन मास्टर  जब मृत्यु के करीब आता है तो चार पंक्तियाँ लिखता है। उसके शिष्य उससे आग्रह करते हैं, चार पंक्तियाँ लिखता है। तीन लिखता है, चौथी खाली है। शिष्य कहता है, ‘आपने कहा था चार लिख रहा हूँ, चौथी खाली कैसे है’? तो जोर से हंसता है, वो उसकी आखिरी हंसी होती है।

कुछ बातें अनकही छोड़ देनी चाहिए। चौथी पंक्ति हमेशा खाली छोड़ी जाए। ये जीवन के लिये एक बात बड़ी महत्वपूर्ण है समझ लो, आखिरी बात कहना मत कभी, वो कहने कि नहीं होती, वो समझने की होती है। आखिरी कदम तक ले जाना साथ, सौ में से निन्यानबे सीढियों तक साथ रहना, सौवीं सीढी पर नहीं। निन्यानबे और सौ से याद आता है कि सूफियों की बड़ी रोचक बात है कि जब वो अल्लाह के नाम गिनाते हैं, सौ नाम, तो सौवां नाम अनकहा छोड़ देते हैं; कहेंगे, “हम कहेंगे नहीं”, खाली आखिरी बात कभी कहनी ही नहीं चाहिये। क्योंकि अगर आखिरी बात भी अभी कहनी पड़ रही है, तो अभी समझा नहीं। सुनने वाले ने समझा ही नहीं। वो अनाड़ी गुरु होंगे जो सब कुछ कह डालते हों। असली गुरु वो, जो कुछ अनकहा छोड़ दे, कभी कहे ही नहीं।तुम पकड़ सकते हो तो पकड़ लो; और

गुरु की गुरुता इसमे है कि तुममें वो काबिलियत जगाए कि तुम अनकहे को भी सुन पाओ।

समझ में आ रही है बात ये? वो असंग है। नहीं, कोई साथ नहीं उसके, कोई मुकाबला नहीं उसका, कोई बराबरी नहीं उसकी, अहंकार के लिये कोई स्थान नहीं। हाँ, मैं एक दूसरी रोचक बात कह रहा था, वही आयत आगे कहती है, आई ऍम दी फर्स्ट ऑफ़ दोज़ हू सबमिट। सबसे आगे निकालूँगा, किसमें?

श्रोतागण: समर्पण में।

वक्ता: समर्पण में। कुछ भी बुरा नहीं है। दौड़ बुरी नहीं है, होड़ बुरी नहीं है, प्रतिस्पर्धा भी बुरी नहीं है, मन यदि निष्ठायुक्त हो। देखो मन में निष्ठा नहीं है, तो तुम न करो प्रतिस्पर्धा तब भी प्रतिस्पर्धा मन में छाई ही रहेगी। वो कहानी सुनी ही होगी न, कि बड़ा बादशाह, बादशाहत तो बड़ी हो गई, लेकिन समझ में आ रहा था कि बात पूरी नहीं बैठ रही है, कोई बहुत बड़ी चीज़ है जो गायब है। और उसके बिना कुछ नहीं। तो किसी ने उसे सुझाया कि ‘धर्म नहीं है तेरी जिंदगी में’, तो उसने पूछा ‘धर्म कैसे आए?’ उसने कहा, ‘उसके लिये दास बनना पड़ता है, बादशाहत छोड़ कर दास बनना पड़ता है’। तो उसने कहा(बादशाह ने), ‘अच्छा ठीक है अब हम दासता त्यागेंगे’ तो मस्जिद जाता है, वहाँ एक फ़क़ीर बैठा हुआ है, वो फ़क़ीर झुक-झुक के, झुक झुक के, क्या प्रार्थना कर रहा है? कि ‘मालिक, मैं तेरा दास, मैं तेरा बहुत बड़ा दास मैं तेरा सबसे बड़ा दास’। फ़क़ीर अपनी धुन में मस्त है, बोले जा रहा है, ‘मैं दासों का दास’; बादशाह बगल में है, बादशाह ने उसको अगले दिन बुलवा लिया अपने दरबार, कहा ‘हिम्मत कैसे हुई बोलने की, कि तू सबसे बड़ा दास? अरे हम हैं सबसे बड़े दास’। तो जब श्रद्धा नहीं होती, तो तुम्हारे समर्पण में भी प्रतिस्पर्धा होती है। समझना बात को। जब श्रद्धा नहीं होती, तो तुम्हारे समर्पण में भी प्रतिस्पर्धा होती है।

जब श्रद्धा होती है, तो तुम्हारी प्रतिस्पर्धा में भी समर्पण होता है।

प्रतिस्पर्धा क्या है? मात्र आचरण है न एक तरह का? तो आचरण नहीं…?

श्रोतागण: अंतस।

वक्ता: अंतस। समझ रहे हो बात को? “आई शैल बी दी फर्स्ट ऑफ़ दोज़ हू सबमिट”।

श्रोता: सर, प्रतिस्पर्धा में भी समर्पण है?

वक्ता: वहां भी समर्पण है। समर्पण पहले है। समर्पण पहले है, ये दौड़ ऐसी है, जैसे कोई अपने प्रेमी से मिलने के लिये दौड़ रहा हो। ये कुछ पाने की दौड़ नहीं है। ये मिलन की दौड़ है। ये कुछ पा लेने की दौड़ नहीं है, ये तो एक हो जाने की दौड़ है। कोई बुराई नहीं है ऐसे दौड़ने में। अगर तुम्हें कोई ये बताए कि दौड़ बुरी होती है हमेशा, तो गलत कह रहा है। कोई तुम्हें अगर ये बताए कि जल्दी में न रहो, कोई तुम्हें ये बताए कि प्रतिस्पर्धा सदैव बुरी है, तो मोटा-मोटी बात तो वो ठीक कह रहा है, लेकिन थोड़ी सी चूक कर रहा है। प्रतिस्पर्धा में दिक्कत है, क्योंकि जो साधारण प्रतिस्पर्धा होती है, वो मन की बेचैनी से निकलती है। वो मन की अपूर्णता से निकलती है। तब प्रतिस्पर्धा बुरी है।

क्रोध भी बुरा, हत्या भी बुरी, साधारणतया; साधारणतया। लेकिन तुम चाहे मुहम्मद का जीवन देखो चाहे कृष्ण का जीवन देखो, हत्याएं, दोनों ने करी और करवाईं। एक समर्पित मन कुछ भी करे, वो शुभ ही होगा। समझ रहे हो बात को? तो बड़ी बात ये नहीं है कि क्या करें, बड़ी बात ये है कि मन कैसा है। बड़ी बात ये बिलकुल भी नहीं है कि कर्म कैसा है, और आचरण कैसा है, बड़ी बात ये है कि किस मन से वो निकल रहा है।

श्रोता: कबीर ने कहा है, “पल में परलय होएगी, बहुरि करोगे कब”।।

वक्ता: बिलकुल, जल्दी करो, क्यों नहीं करो? कुछ भी वर्जित नहीं है। सब, सब कुछ कर सकते हो। काम में भी कोई बुराई नहीं है। आज हमने दिन की शुरुआत करी थी, तो मैंने कुछ बाते बोली थीं, कि शरीर हमेशा प्रकृति के अधिनस्थ रहता है; और प्रकृति अंततः तुमसे यही चाहती है कि तुम वासना में उतरो, काम में उतरो, शारीरिक मिलन हो और उससे, प्रजनन, संतान उत्पत्ति हो, बच्चे पैदा हों, क्या बुराई है उसमें? कोई बुराई नहीं है।

सेक्स में कोई बुराई नहीं है, दिक्कत ये है कि कौन सा मन है? कौन सा मन है? चूकी हज़ार में से नौ सौ निन्यानबे मामलों में जब तुम सेक्स की तरफ जाते हो, तो दूसरे को मात्र शरीर की तरह, एक वस्तु है जिसका उपभोग करना है, ऐसे देख रहे होते हो। तब सेक्स गन्दा है, घटिया है। घटिया इस लिये है, क्योंकि तुमने किसी को उपभोग की चीज़ बना दिया। तुम्हें उसमें आत्मा नहीं दिख रही। तुम्हें उसमें बस देह, पदार्थ दिख रहा है। और नहीं कोई दिक्कत है। क्या दिक्कत हो सकती है? एक शारीरिक क्रिया है, इतनी शारीरिक क्रियाएँ होती हैं, वो भी एक शारीरिक क्रिया है, उसमें कोई बुराई नहीं, कुछ गन्दा नहीं। गन्दा जो है, वो यही है कि तुम दूसरे को कैसे देख रहे हो? तुम्हें उसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ मास नजर आता है? पर यही मिलन, यही संभोग, अगर एक एकनिष्ठ मन से हो रहा है, तो फिर बहुत अच्छे। अड़चन बस यही है कि वैसा एकनिष्ठ मन बिरला होता है। कोई एक होता है, हजारों में, लाखों में। तो इसीलिए साधारणतया ये कहना उचित ही है कि कामवासना से बचो। बिलकुल उचित है। लेकिन वो नियम भी योगी पर नहीं लागू होता।

योगी, योगी माने कौन? जो मिल गया है। उसको कुछ नहीं वर्जित है। सब उपलब्ध है। सही जगह पर बैठ कर के, मन को, उसके सही स्थान पर स्थापित कर के, फिर घूमो, फिरो, स्मृतियों में जाओ, कल्पनाओं में जाओ, ना भूत वर्जित है, ना भविष्य वर्जित है। ना भोग वर्जित है, ना संभोग वर्जित है। उड़ो। लेकिन जैसे ही तुमसे ये कह रहा हूँ, मन सतर्क कर रहा है, कि शायद इसको अनकहा ही छोड़ देना चाहिये। कहा नहीं…

श्रोता: उड़ने ही चलें।

वक्ता: कि गड़बड़ हो सकती है। तो इस बात को यहीं रोक ही देते हैं।


सत्र देखें: वह निःसंग है; मात्र वह ही है

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लेख २:  मन के बहुतक रंग हैं 


सम्पादकीय टिप्पणी :

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