मन की दौड़

‘मन का होना ही एक दौड़ है’ और व्यर्थ ही नहीं दौड़ रहा, उसे वास्तव में पहुंचना है; वो बेचैन है, उसकी बेचैनी झूठी नहीं है लेकिन मन का दौड़ना वैसा ही है, जैसे कोई इस कमरे के भीतर-भीतर दौड़ता रहे और उम्मीद उसने ये बाँध रखी हो कि वो कहीं पहुँच जाएगा। उसकी कोशिशों में कमी नहीं है, बस उसके पास डर है, दीवारें हैं और श्रद्धाहीनता है। खूब दौड़ता है, खूब मेहनत करता है; श्रमिक है मन लेकिन ये हिम्मत नहीं कर पाता है कि तोड़ ही दे दीवारें।


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