मन की दौड़ ही मन का बंधन है

                                                    माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।

                                                     कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥

                                                                           – कबीर

वक्ता: मन से ज्यादा कहीं पहुँचने को कोई आतुर नहीं होता और मन से ज्यादा पहुँचने से कोई डरता नहीं है। बड़ी गहरी बेचैनी रहती है मन की, कि किसी भी तरिके से पहुँच ही जाऊं।

‘मन का होना ही एक दौड़ है’ और व्यर्थ ही नहीं दौड़ रहा, उसे वास्तव में पहुंचना है; वो बेचैन है, उसकी बेचैनी झूठी नहीं है लेकिन मन का दौड़ना वैसा ही है, जैसे कोई इस कमरे के भीतर-भीतर दौड़ता रहे और उम्मीद उसने ये बाँध रखी हो कि वो कहीं पहुँच जाएगा। उसकी कोशिशों में कमी नहीं है, बस उसके पास डर है, दीवारें हैं और श्रद्धाहीनता है। खूब दौड़ता है, खूब मेहनत करता है; श्रमिक है मन लेकिन ये हिम्मत नहीं कर पाता है कि तोड़ ही दे दीवारें।

क्या है मन की दीवारें? ध्यान से समझियेगा मन की दौड़ ही, मन का घेरा ही, मन की दीवारें हैं; किसी और दीवार में नहीं कैद है मन, मन जहाँ तक जाता है, दौड़-दौड़ कर वहीं मन की दीवार है, उसके आगे नहीं जा पाता वो, कोई बाहरी दीवार नहीं है जो मन को रोक रही है। तुम दौड़ना शुरू करते हो और जहाँ तक जा-जा के तुम लौट आते हो, वही तो तुम्हारी दीवार है। कोई बाहरी दीवार है ही नहीं, जिसको तुम पार नहीं कर पा रहे हो, जहाँ तक तुम जाते हो और अटक-अटक जाते हो, वही तुम्हारी दीवार है।

दीवारों को बाहरी समझो तो एक तरीका सूझता है, क्या? कि दीवारों को हथौड़ा मार-मार के तोड़ देंगे, गिरा देंगे; दीवारें हैं। दीवारों ने मन को कैद कर रखा है, इसी कैद के कारण मन जहाँ पहुचना चाह रहा है वहाँ पहुँच नहीं पा रहा है। मारो दीवारों को, गिरा दो, पर ये धोखा हो जाएगा क्योंकि कोई दीवार बाहरी है ही नहीं। ‘मन की दौड़ का ही नाम दीवार है’ और जब ये समझ लिया जाए कि मन की दौड़ का ही नाम दीवार है, तब दीवार गिराना और आसान हो जाता है। अब मन को क्या करना है? मन को ठहर जाना है। मन खूब दौड़ता है, खूब दौड़ता है, खूब दौड़ता है और पाता नहीं है और इसी कारण नहीं पाता नहीं है क्योंकि खूब दौड़ता है! जहाँ भी दौड़ेगा मन ही दौड़ेगा। इन दीवारों को गिराने का तरीका ये है कि दौड़ को ही रोक दिया जाए। जैसे ही दौड़ रुकेगी पता चलेगा, दीवार थी ही नहीं, मेरी दौड़ ही दीवार का निर्माण कर रही थी; मेरी ये कोशिश कि पा लूँ, यही मेरे भीतर खालीपन निर्मित करती थी।

दौड़त दौड़त दौड़ीया जेती मन की दौड़।

दौड़ दौड़ मन थम गया, वस्तु ठौर की ठौर।।

मन जहाँ तक दौड़ सकता था, उसने दौड़ लिया, ‘दौड़त दौड़त दौड़ीया जेती मन की दौड़’, जितनी तेरी ताक़त थी दौड़ लिया और पूरा दौड़ लेने के बाद जब मन थमा तो क्या पाता है? जिस चीज़ के पीछे दौड़ रहा था वो वहीं कि वहीं है ‘वस्तु ठौर की ठौर’, दौड़ थक मन थम गया वस्तु ठौर की ठौर। जब कबीर कह रहे हैं कि “माला फेरत जुग भया, नहीं वो उसी माला की बात नहीं कर रहें हैं जो हाथ में फेरी जाती है, माला से अर्थ है वो, जो गोल-गोल लगातार दौड़ चल ही रही है, जुगों से चल रही है कि कुछ मिल जाएगा, लगातार मन की कोशिश चल ही रही है, हज़ार मालाएं फेरी हैं उसने; मालाएं बदलती रहीं हैं, माला फेरने वाल कायम रहा है।

‘करका मन का छांड़ दे, मन का मन का फेर’ और ‘मन का मन का फेरने’ का यही अर्थ है कि उस गोले में उस वृत्त में, उस घेरे में, तू दौड़ना छोड़ दे, तू कितना दौड़ेगा? तू कितना सर पटकेगा? ये अजीब दीवार है, ये पैदा ही इसीलिए होती है क्योंकि तू इसपर सर पटकता है ये अजीब सा कारागार है, जो है ही इसलिए क्योंकि तू मुक्त होना चाहता है।बंधन पहले नहीं आया है, तेरी मुक्ति की आकांक्षा ही तेरा बंधन है, तू मुक्ति की आकांक्षा छोड़ दे, शांत होकर बैठ जा। उसका तत्व समझिये, मुक्ति की आकांक्षा में ये भाव बहुत गहरा है कि ‘मेरी’ आकांक्षा से मैं मुक्त हो सकता हूँ।

मुक्ति की आकांक्षा ही  बंधन है।

बात समझिएगा मुक्ति की आकांक्षा कहती है कि ‘मैं चाहूँगा’ तो मैं मुक्त हो जाऊँगा और ये भाव तो हम में रहता ही है न? “तुम्हारे चाहे तो तुम मुक्त भी नहीं हो सकते” जितना जोर से चाहोगे मुक्ति होना, उतना ही बंध जाओगे; बंधन और कुछ है नहीं, मैं दोहरा रहा हूँ– मुक्ति की आकांक्षा ही बंधन है क्योंकि हर आकांक्षा के पीछे ‘आप’ हैं आपका आग्रह है मुक्ति का, आप चाहोगे मुक्ति कभी मिलेगी नहीं, क्योंकि चाह-चाह कर आप चाहने वाले को मौजूद कर रहे हो और इस चाहनेवाले से ही तो मुक्त होना है।

मुक्ति की चाह नहीं चाहिए, चाहने वाले से मुक्त होना है।

और चाहने वाला कैसे जीवित रहता है? चाह-चाह के! जो चाहने वाला है, उसके पास तो जीवित रहने का एक ही तरीका है कि और चाहो! ये नहीं चाहना, वो नहीं चाहना, दुनियादारी नहीं चाहनी, तो मुक्ति चाहो! चाहा किसने? जो भी चाहा, चाहा किसने?

{हँसते हुए}

“माया तो ठगनी बड़ी” पता भी नहीं चलता कि मुक्ति की चाह में भी वो बंधन लेकर हाज़िर है। जो मुक्ति का आकांक्षी है, अरे जिसने बड़े यत्न करे हैं मुक्ति के, जो निरंतर अथक साधना में लगा हुआ है मुक्ति की। थोड़ा थम जाओ, थोड़ा रुक जाओ; वो दीवारें जिनसे मुक्त होना चाहते हो, तुम्हारे थमते ही हट जाएंगी। वो दीवारें हैं ही नहीं, कोई दीवार नहीं है, जिसको तोड़ना है। ये ऐसा ही है, जैसे खुले मैदान में तुमने खूब गोल घूम-घूम कर, घूम-घूम कर एक घेरा बना लिया हो और फिर तुम कहो इस घेरे से अब मुक्त होना है; वो घेरा बन कैसे रहा है? तुम्हारी कोशिशों से ही तो बन रहा है। कोशिशें बंद कर दो; मुक्ति कोई हासिल करने वाली चीज़ नहीं है।

 श्रोता१: सर, पर ये तो सेकंड स्टेप की बात हो गयी न? जैसे कि एक जगह कहते हैं कि जब तक चाहोगे नहीं तो मिलेगा कैसे? और दूसरे स्टेप  में कहते हैं कि मिल इसलिए नहीं रहा क्योंकि चाह रहे हो।

वक्ता: वो जो चाह है कि पा लूँ, दीवारें तोड़ दूँ, वो कहाँ से शुरू हो रही है? दीवारों के आभास से ही तो वो चाह शुरू हो रही है। ठीक? पहले दीवारों का आभास आएगा, फिर कहते हो कि दीवारें तोड़ो और दीवारें कहाँ से आयी?

श्रोता {सभी एक स्वर में}: दौड़ से।

वक्ता: तुम्हारी दौड़ से, दौड़ में तुमने पहले ही ये चाह रखा है कि जो मिला ही है, उससे दूर हो जाऊं। भाग-भाग के, भाग-भाग के तुम कर क्या रहे हो? ये बात बड़ी मज़ेदार है, हम ये तो कह देते हैं कि कोशिश कर-कर के तुम पा भी नहीं सकते, तुम कोशिश कर-कर के नहीं पा सकते। तुम्हारी सीमा के, तुम्हारी काबिलियत के बाहर की बात है कि तुम पा लो, पाने के बारे में तो आपने खूब सुना होगा, कि तुम कोशिश कर-कर के पा नहीं पाओगे।

कबीर आगे की बात कर रहे हैं, कबीर कह रहे हैं कि तुम ‘कोशिश कर-कर के छोड़ भी नहीं पाओगे’! क्योंकि हर कोशिश जैसे पाने वाले को पुख्ता करती है, वैसे ही छोड़ने वाले को भी पुख्ता करती है। यत्न करता तो वही है ना? अब ये बड़ा बुरा लगता है मन को कि हम इतना कुछ पाने की राह पर थे, इतना कुछ हमने पा लिया था, फिर हमें सिखाया गया कि छोड़ो; अकड़ना बुरी बात है, आसक्ति बुरी बात है, संग्रह बुरी बात है, तो हमने छोड़ा; अपरिग्रह। और अब हम से कहा जा रहा कि तुम तो छोड़ भी नहीं सकते। अपने चाहे तो तुम छोड़ भी नहीं सकते, क्योंकि जो पाने वाला था वही तो छोड़ने वाला है। खेल बदल रहा है बस कभी वो पाने में लगा हुआ था, अब वो?

श्रोता {एक स्वर में}: छोड़ने में लगा हुआ है।

वक्ता: छोड़ने को उद्यत है। अपने चाहे तो तुम सिर भी नहीं झुका पाओगे क्योंकि जो सिर उठाने में लगा हुआ था, अब उसको सिर झुकाने में बड़ा मज़ा आ रहा है। बड़े सूक्ष्म खेल हैं ये! “मैं आज सिर झुकाने आया हूँ”; “मैं आज समर्पण करने आया हूँ”।

मध्य-प्रदश में बड़े डकैत हुआ करते थे,सुना होगा, चम्बल।

श्रोता२: भिंडमुरैना।

वक्ता: भिंडमुरैना; ये जो पूरी घाटी है वो। फिर आज से करीब बीस-पच्चीस साल पहले उन्होंने समर्पण किया। अर्जुन सिंह, मुख्यमंत्री थे मध्यप्रदेश के, उस समय ये काम शुरू हुआ था; तो उनकी फोटो छपती थी, समर्पण करते समय, डकैतों की; तो जब समर्पण करने आते थे और सरकार की ओर से योजना थी कि समर्पण करोगे तो सज़ा कम रहेगी और परिवार वालो को ये मदद मिलेगी, तो जब समर्पण करने आते थे, तो जो भाव होता था, वो ठीक वैसा ही होता था, जैसे किसी को गोली मारते समय होता है। उतना ही चौड़ा! हम समर्पण करने आये हैं! तो वैसे ही हम आते हैं समर्पण करने, कि ‘अरे हम आये हैं’। राजा हुए हैं कई, जो हर साल अपना सब कुछ दे दिया करते थे, दान में। सब कुछ दे देंगे और आप उनके किस्से देखिये, आप उनके चित्रों को देखिये, जब वो दान दे रहे हैं ‘अरे हमने सब कुछ दे दिया!’। तुम कुछ भी कर लोगे, तुम दीवारों का ही निर्माण करोगे, तुम्हारा हर करना, एक नई दीवार है और जब तक इसको समझते नहीं, दीवारें खड़ी ही करते जाओगे; तुम्हारा हर करना, तुम्हारा समर्पण भी तुम्हें फसा रहा है।

{मुस्कुराते हुए}

‘करका मन का छाड़िं दे’

 श्रोता३: सर, अहंकार तो यहाँ पर सिर्फ़ एक भाव ही तो है? अगर समर्पण में वो भाव ही न हो जो ये एहसास करवाए कि हम आए हैं समर्पण करने..

वक्ता: वो भाव किसको आएगा? ‘अब हम वो हैं, जो समर्पण करने आये थे पर अब हमें ये भाव आ गया कि हम समर्पण करने आये थे’ तो ‘अब हम वो हैं जिन्हें ये भाव है, कि अब हमें वो भाव नहीं है’।

{सभी हँसते हैं}

श्रोता३: सर इस तरह से तो उस दीवार से कोई बाहर जा ही नहीं पाएगा।

वक्ता: बिलकुल ठीक कहा, तो एक ही तरीका बचता है, क्या?

श्रोता४: ‘मैं’ को हटा दो।

वक्ता: कौन हटाएगा?

श्रोता४ {हँसते हुए}: मैं।

वक्ता: सुनिए ध्यान से, समझिये बात को कि आपके हटाए कुछ हटेगा नहीं, और इकट्ठा होगा और ध्यान उसी प्रक्रिया का नाम है, जिसमें मात्र सुनना शेष रह जाता है, आप नहीं तो मैं को ज़रा हटाईये वास्तव में, ध्यान में आईये; ‘दौड़-दौड़ मन थमि गया, वस्तु ठौर की ठौर, कबीर कहते हैं या तो थक लो, या समझ लो। दोनों एक बराबर रास्ते हैं, दोनों में से कुछ भी श्रेष्ठतम नहीं है। थक लो, क्योंकि समय की कोई सीमा नहीं है; सौ, हज़ार, दो हज़ार जन्मों तक कोशिश कर लो, जब बिलकुल अधमरे होकर गिर पड़ोगे, तो ये दिखाई देगा– हैं! दौड़ क्यूँ रहा था! या तो ये कर लो या समझ लो; पर “तुम्हारी” समझ से नहीं होगा काम। तुमने जो भी समझा होगा, उससे नहीं काम होगा, समझ भर लो।

श्रोता३: समझेगा भी तो “मैं” ही!

वक्ता: उससे कुछ होगा नहीं।

श्रोता५ {दुविधा में}: ये कैसी बात हुई?

{सभी हँसते हैं}

वक्ता: इसका अर्थ ये है कि जब भी तुम्हें लगा कि “तुम्हें” समझ में आ गया तो तुम्हें कुछ समझ में नहीं आया; वो “तुम्हारी” समझ जो है वो किसी काम की नहीं है। तुम्हें जब भी लगेगा कि तुम्हें सब समझ में आ रहा है और बड़ा आनंद आ रहा है समझ-समझ के, तो तुम्हें कुछ समझ में नहीं आया है। समझ लो, पर तुम्हारी समझ नहीं होनी चाहिए, जिस दिन वास्तव में समझोगे, उस दिन तुम्हें पता ही नहीं चलेगा कि तुम्हें समझ में आ गया है; उसको सत्संग कहते हैं। जहाँ सब मिल गया और पता भी नहीं चला कि मिल गया। हाँ, जीवन बदल जाएगा, पर ठीक-ठीक बता नहीं पाओगे कि किस कारण बदल रहा है। जहाँ कहीं भी तुम्हारी समझ होगी, वो तुमसे बड़ी नहीं हो सकती, तुम्हारे कटोरे में, कटोरे से ज़्यादा पानी थोड़ी आ जाना है। “तुम्हारी समझ नहीं, मात्र समझ” और जब मात्र समझ होगी तो वो तुम्हें समझ जैसी लगेगी नहीं या तो तुम उसके प्रति अनभिज्ञ रहोगे या वो तुमको बेवकूफी भी लग सकती है। अगर बिलकुल ठीक-ठीक समझ में आ रहा हो, बिलकुल आ गयी बात समझ में, तो बेकार ही गया तुम्हारा बैठना। सब समझ गये? चलो कोई बात नहीं, फिरसे देखेंगे।

इस जगत के नियम वहाँ नहीं चलते, इस जगत में जब शिक्षण होता है, पढ़ाई होती है तो आपके शिक्षक को बड़ा अच्छा लगता है कि वो आपसे सवाल पूछे और आप उन सवालों के ठीक-ठीक जवाब दे दें, क्योंकि वो पूछेगा भी क्या? मात्र वही जो उसने पढ़ाया है। उसको बड़ा अच्छा लगेगा, आप जवाब दे दिजिये क्योंकि जो पढ़ाया गया है और उसमें से ही पुछा जा रहा है तो जवाब स्मृति से ही देना है तो खुश हो जाएगा।

गुरु को कोई प्रसन्नता नहीं होनी है अगर आप साफ़-साफ़ बता दें कि आज आपने ये पढ़ाया। वो तुम्हें कोई ज्ञान थोड़ी दे रहा है, जो तुमने इकट्ठा कर लिया, वो तो ‘मन का मन का फिरा रहा है’; वो तुम्हारे मन में और जानकारी नहीं दे रहा है, वो मन का ही बदलाव कर रहा है। इसीलिए, जो बोधयुक्त होता है; शास्त्र कहते हैं कि वो बड़ा मूढ़वत व्यवहार करता है, बड़ा नासमझों जैसा दिखाई देता है। मूढ़वत ही नहीं, ‘पशुवत’ भी; उसके होने में, जीवन में, आचरण में, हमारी आँखों को समझदारी कहीं दिखाई ही नहीं देगी; हमारी आँखों को क्या, उसकी आँखों को भी समझदारी नहीं दिखाई देगी।

बुल्लेशाह कहते है “गुनहिं भराह मैं फिरेया, लोग कहें दरवेश”; मैं गुन्हाओं से भरा फिरता हूँ और लोग मुझे दरवेश समझते हैं; वो कहते हैं कि मेरा तो भेष भी काला है, सूफी काले कपड़े पहनते हैं। आप उसी से पूछो तू कितना समझदार है? कहेगा कि ‘मैं समझदार?’ और वो कोई विनम्रता ओढ़ नहीं रहा है उसने सीख नहीं लिया है कि सबको बताना चाहिए कि मझे ज्यादा कुछ नहीं आता है, उसको वास्तव में नहीं पता की उसको कुछ आता है। इसी कारण आप उससे कहिये कि तू ज़रा ग्रन्थ लिख दे अपने ज्ञान का, तो वो लिख नहीं पाएगा, बड़ा मुश्किल हो जाएगा उसके लिए कहेगा क्या लिख दूं?

हाँ, संवाद कर सकते हो, बातचीत करो तो अगर कुछ है तो वो अपने आप को प्रकट कर देगा। और ऐसे ही विश्व के श्रेष्ठतम ग्रन्थ लिखे भी गये हैं- संवाद में क्योंकि संवाद के अतिरिक्त उसको भी नहीं पता कि उसको क्या पता है! उसकी कोई समझ है ही नहीं व्यक्तिगत तो वो कैसे बताए तुम्हें कि उसे क्या पता है? जब उसे ही नहीं पता तो तुम्हें क्या बताएगा! हाँ करो बातचीत, तब निकलेगा पर जो निकलेगा वो भी उसका अपना है ही नहीं; वो रेडियो की भाँती है, वो तो बस पाता है और बोल देता है। हमने क्या कहा था थोड़ी देर पहले? कि पाना है और गाना है; वही काम जो एक रेडियो  करता है– वो पाता है और गा देता है। उसमें उसका अपना क्या है? तुम उससे कहो कि अपनी आत्मकथा लिखो, ज़रा जीवन भर का जो तुम्हारा ज्ञान है, उससे एक पुस्तक तैयार कर दो, वो नहीं कर पाएगा। हाँ, तुममें सुनने की उत्सुकता है तो सामने बैठो तो उस वार्तालाप में, उस संवाद में, फिर वहाँ से उपनिषद पैदा होते हैं। ऐसे ही आये हैं सारे उपनिषद– बैठा है गुरु और सामने बैठे हैं शिष्य और जो बातचीत है उसी का नाम उपनिषद है। इसका ये अर्थ नहीं है कि गुरु आलसी है कि अलग से बैठ के लिख नहीं सकता, उसके लिए असंभव है अलग से बैठ के लिखना; वो कहेगा कि क्या लिखूं; कुछ पता ही नहीं है तो लिखूं क्या?

किस्से कहानियाँ लिखे जा सकते हैं, एकांत में बैठ करके, रामायण और महाभारत संवाद नहीं हैं; वो अकेले बैठ के लिख लोगे पर गीता के लिए तो चाहिए कोई अर्जुन, जो खींच ले कृष्ण के भीतर से।


सत्र देखें: मन की दौड़ ही मन का बंधन है 

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लेख १: तुम्हारी चालाकी ही तुम्हारा बंधन है; जो सरल है वो स्वतंत्र है

लेख २:  मन के बहुतक रंग हैं 


सम्पादकीय टिप्पणी :

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