अच्छा-बुरा मन का खेल

हम जिनको अच्छाई कहते हैं, हम जिनको बुराई कहते हैं, ये दोनों ही मन की निर्मित्तियाँ हैं। इनको हमने ही बनाया है। और ये हमारे अहंकार को बनाये रखने में सहायक हैं। ये कोई दैवीय आदेश नहीं हैं। ये तो हमारी ही अपनी परिकल्पनाएँ हैं जिनको हमने अपने ऊपर ही लाद लिया है नैतिकता बना के। हम कहते हैं जो अच्छा है वो करो और जो बुरा है वो ना करो ।


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